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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 4 [31-34]

अध्याय 4: समाधि

मूल श्लोक · 4.31

प्रनष्टश्वासनि:श्वास: प्रध्वस्तविषयग्रह: । निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जयति योगिनाम् ।। 31 ।।

भावार्थ

जिस साधक के प्राणों की गति समाप्त हो गई है अर्थात् जिसने प्राणायाम द्वारा अपने श्वास- प्रश्वास को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया है । जिस साधक की इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों का पूर्ण रूप से त्याग हो चुका है अर्थात् जिस की इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से उसके नियंत्रण में हो चुकी हैं । जिसकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो चुकी हैं । जो सभी विकारों से रहित हो गया है । ऐसे योगियों को लय की प्राप्ति होती है ।

मूल श्लोक · 4.32

उच्छि न्नसर्व सङ्कल्पो नि:शेषाशेषचेष्टित: । स्वावगम्यो लय: कोऽपि जायते वागगोचर: ।। 32 ।।

भावार्थ

जिस साधक के सभी संकल्प समाप्त हो गए हैं और कोई भी इच्छा शेष न बची हो अर्थात् जिसकी सभी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हैं । ऐसी लय की अवस्था को स्वयं के द्वारा ही अनुभूत ( महसूस ) किया जा सकता है । वाणी द्वारा इसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।

मूल श्लोक · 4.33

यत्र दृष्टिर्लयस्त्र भूतेन्द्रियसनातनी । सा शक्तिर्जीवभूतानां द्वे अलक्ष्ये लयं गते ।। 33 ।।

भावार्थ

जहाँ पर साधक की दृष्टि एकाग्र होती है । वहीं पर लय का स्थान होता है ।

वहाँ पर सभी पंच महाभूतों ( आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी ) व इन्द्रियों की परम्परागत शक्ति होती है । उस शक्ति में जीवात्मा के सभी उद्देश्य विलीन हो जाते हैं ।

मूल श्लोक · 4.34

लयो लय इति प्राहु: कीदृशं लयलक्षणम् । अपुनर्वासनोत्थानाल्लयो विषयविस्मृति: ।। 34 ।।

भावार्थ

कुछ योग साधक मात्र लय- लय कहते रहते हैं । लेकिन लय होता क्या है ? यह उनको नहीं पता होता । जहाँ पर सभी वासनाएँ पूरी तरह से विलीन हो जाती हैं अर्थात् जिस अवस्था में कभी भी वासना प्रबल नहीं होती । जहाँ किसी विषय की कोई भी स्मृति शेष नहीं बचती है । वह स्थिति लय की होती है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  2. Anju siwach

    Thank you very much sir

  3. आलोक कुमार पटवा

    अति सुन्दर व्याख्या गुरुदेव!