शक्तिचालिनी मुद्रा की भूमिका     मूलाधारे आत्मशक्ति: कुण्डली परदेवता । शयिता भुजगाकारा सार्द्ध त्रिवल यान्विता ।। 49 ।। यावत् सा निद्रिता देहे तावज्जीव: पशुर्यथा । ज्ञानं न जायते तावत् कोटियोगं समभ्यसेत् ।। 50 ।। उद्घाटयेत् कपाटञ्च यथा कुञ्चिकया हठात् । कुण्डलिन्या: प्रबोधेन ब्रह्मद्वारं प्रभेदयेत् ।। 51 ।। नाभिं संवेष्टय वस्त्रेण न च नग्नो बहिस्थित:

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Gheranda Samhita Ch. 3 [49-60]

तडागी मुद्रा विधि व फल वर्णन   उदरं पश्चिमोत्तानं कृत्वा च तडागाकृतिम् । तडागी सा परामुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।। 61 ।।   भावार्थ :-  पश्चिमोत्तान आसन करके अपने उदर अर्थात् पेट को तालाब की आकृति के समान बना लेना तडागी मुद्रा कहलाती है । यह अति श्रेष्ठ मुद्रा बुढ़ापे ( वृद्धावस्था ) व मृत्यु का नाश

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Gheranda Samhita Ch. 3 [61-63]

शाम्भवी मुद्रा विधि वर्णन   नेत्राञ्जनं समालोक्य आत्मारामं निरीक्षयेत् । सा भवेच्छाम्भवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।। 64 ।।   भावार्थ :-  दोनों नेत्रों से अपनी दोनों भौहों के बीच में देखते हुए मन द्वारा आत्म चिन्तन करने को शाम्भवी मुद्रा कहा गया है । सभी शास्त्रों में इस मुद्रा को गुप्त बताया गया है ।

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Gheranda Samhita Ch. 3 [64-67]

पञ्चधारणा मुद्रा वर्णन   कथिता शाम्भवी मुद्रा श्रृणुष्व पञ्चधारणाम् । धारणानि समासाद्य किं न सिद्धयति भूतले ।। 68 ।। अनेन नरदेहेन स्वर्गेषु गमनागमम् । मनोगतिर्भवेत्तस्य खेचरत्वं न चान्यथा ।। 69 ।।   भावार्थ :-  इस प्रकार पिछले श्लोक में शाम्भवी मुद्रा का वर्णन किया गया है । अब पञ्च धारणा मुद्रा के वर्णन को सुनो

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Gheranda Samhita Ch. 3 [68-71]

आम्भसी धारणा मुद्रा विधि वर्णन   शङ्खेन्दुप्रतिमञ्च कुन्दधवलं तत्त्वं किलालं शुभम् तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषादु: सहतापपापहरिणी स्यादाम्भसी धारणा ।। 72 ।।   भावार्थ :-  इसका वर्ण शंख है जो चन्द्रमा की भाँति सुन्दर है, इसका रंग कुन्द के फूल की तरह ही सफेद है जिसमें अमृत का निवास है

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Gheranda Samhita Ch. 3 [72-76]

वायवीय धारणा मुद्रा विधि वर्णन   यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं धूम्रावभासं परं तत्त्वं सत्त्वमयं यकार सहितं यत्रेश्वरो देवता । प्राणां विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ।। 77 ।।   भावार्थ :-  इस मुद्रा का वर्ण अन्य से थोड़ा अलग अर्थात् काजल के चूर्ण की तरह अर्थात् धुएँ के रंग जैसा होता है ।

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Gheranda Samhita Ch. 3 [77-79]

आकाशीय धारणा मुद्रा विधि वर्णन   यत् सिन्धौ वरशुद्धवारिसदृशं व्योमं परं भासितं तत्त्वं देवसदाशिवेन सहितं बीजं हकारान्वितम् । प्राणां विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा मोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणा ।। 80 ।।   भावार्थ :-  इस आकाशीय धारणा मुद्रा का वर्ण अर्थात् रंग सिन्धु नदी के जल जैसा होता है । यह आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है ।

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Gheranda Samhita Ch. 3 [80-81]