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  • Gheranda Samhita Ch. 3 [77-79]

वायवीय धारणा मुद्रा विधि वर्णन

 

यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं धूम्रावभासं परं तत्त्वं सत्त्वमयं यकार सहितं यत्रेश्वरो देवता ।

प्राणां विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ।। 77 ।।

 

भावार्थ :-  इस मुद्रा का वर्ण अन्य से थोड़ा अलग अर्थात् काजल के चूर्ण की तरह अर्थात् धुएँ के रंग जैसा होता है । यह वायु तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है । इसका बीजमन्त्र ‘यँ’ अर्थात् यकार है । इसका चक्र अनाहत होता है, जो हमारे हृदय प्रदेश में स्थित होता है । ईश्वर इसके देवता कहे जाते हैं । अपने प्राणों को शरीर के अन्दर भरकर उन्हें पाँच घटी अर्थात् दो घण्टे तक शरीर के अन्दर ही रोकते हुए चित्त में उसका ध्यान करना चाहिए । इसे वायवीय धारणा कहते हैं । ऐसा करने से साधक को आकाश में घूमने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है ।

 

 

विशेष :- परीक्षा से सम्बंधित कुछ आवश्यक प्रश्नों का वर्णन इस प्रकार है :- इस धारणा का तत्त्व कौनसा है ? उत्तर है वायु । इस धारणा का रंग कौनसा कहा गया है ? उत्तर है धुएँ जैसा । इसका बीज अक्षर क्या है ? उत्तर है ‘यँ’ अथवा यकार । इस धारणा का सम्बंध किस चक्र से होता है ? उत्तर है अनाहत चक्र । इस मुद्रा का देवता किसे कहा जाता है ? उत्तर है ईश्वर । साथ ही इससे आकाश में घूमने की शक्ति अथवा सिद्धि प्राप्त होती है ।

 

 

वायवीय धारणा मुद्रा का फल

 

इयं तु परमा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।

वायुना म्रियते नापि खे च गतिप्रदायिनी ।। 78 ।।

 

भावार्थ :-  इस वायवीय मुद्रा को अति विशिष्ट मुद्रा माना जाता है । यह बुढ़ापे व मृत्यु का नाश करने वाली मुद्रा कही जाती है । इसके अभ्यास से साधक को आकाश में घूमने की शक्ति प्राप्त होती है । इसके अलावा कभी भी साधक की मृत्यु वायु के वेग से नहीं होती है ।

 

 

 

विशेष :-  इस मुद्रा के प्रभाव से साधक को आकाश में घूमने की शक्ति प्राप्त होती है साथ ही उसकी मृत्यु कभी भी वायु के वेग ( तेज गति ) से नहीं होती ।

 

 

वायवीय धारणा मुद्रा प्रयोग में सावधानी

 

शठाय भक्तिहीनाय न देया यस्य कस्यचित् ।

दत्ते च सिद्धिहानि: स्यात् सत्यं वच्मि च चण्ड ते ।। 79 ||

 

भावार्थ :-  इस वायवीय धारणा मुद्रा का उपदेश किसी भी दुष्ट, भक्तिहीन अर्थात् जिसमें भक्ति भावना न हो व चाहे जिसको ( किसी को भी ) नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से अर्थात् अयोग्य व्यक्ति को इसका ज्ञान देने से साधक की सभी सिद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसमें किसी तरह का कोई सन्देह अर्थात् शक नहीं है ।

 

 

विशेष :-  इस मुद्रा के सम्बन्ध में यह पूछा जा सकता है कि किस प्रकार के व्यक्ति को इसका मुद्रा का ज्ञान अथवा उपदेश नहीं देना चाहिए ? उत्तर है दुष्ट, भक्ति रहित व चाहे जिसको अर्थात् किसी भी राह चलते को इसका ज्ञान नहीं देना चाहिए ।

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