Skip to content

Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [72-76]

अध्याय 3: मुद्रा

आम्भसी धारणा मुद्रा विधि वर्णन

मूल श्लोक · 3.72

शङ्खेन्दुप्रतिमञ्च कुन्दधवलं तत्त्वं किलालं शुभम् तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषादु: सहतापपापहरिणी स्यादाम्भसी धारणा ।। 72 ।।

भावार्थ

इसका वर्ण शंख है जो चन्द्रमा की भाँति सुन्दर है, इसका रंग कुन्द के फूल की तरह ही सफेद है जिसमें अमृत का निवास है । यह जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है । इसका चक्र स्वाधिष्ठान है, इसका बीज अक्षर ‘वँ’ अर्थात् वकार है । विष्णु को इसका देवता कहा गया है । अपने प्राणवायु को शरीर के अन्दर भरकर उसे पाँच घटी अर्थात् दो घण्टे तक अन्दर ही रोककर रखते हुए चित्त में स्थिर करें । साधक के सभी दुःखों व पापों को दूर करने वाली इस आम्भसी धारणा को जलतत्त्व की धारणा भी कहते हैं ।

विशेष

परीक्षा से सम्बंधित कुछ आवश्यक प्रश्नों का वर्णन इस प्रकार है :- इस धारणा का तत्त्व कौनसा है ? उत्तर है जल । इस धारणा का रंग कौनसा कहा गया है ? उत्तर है सफेद । इसका बीज अक्षर क्या है ? उत्तर है ‘वँ’ अथवा वकार । इस धारणा का सम्बंध किस चक्र से होता है ? उत्तर है स्वाधिष्ठान चक्र । इस मुद्रा का देवता किसे माना गया है ? उत्तर है विष्णु ।

आम्भसी धारणा मुद्रा का फल

मूल श्लोक · 3.73

आम्भसीं परमां मुद्रां यो जानाति स योगवित् । जले च गम्भीरे घोरे मरणं तस्य नो भवेत् ।। 73 ।।

मूल श्लोक · 3.74

इयं तु परमा मुद्रा गोपनीया प्रयत्नतः । प्रकाशात् सिद्धिहानि: स्यात् सत्यं वच्मि च तत्त्वत्त: ।। 74 ।।

भावार्थ

जो इस श्रेष्ठ आम्भसी मुद्रा को जानता है । उसे योग का ज्ञानी अथवा जानकार माना जाता है । इस मुद्रा के प्रभाव से साधक गहरे से गहरे जल में भी नहीं डूबता अर्थात् उसकी जल में डूबने से मृत्यु नहीं हो सकती ।

इस श्रेष्ठ मुद्रा को सदा प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए । इसको सबके सामने करने से अथवा इसे सबको बताने से सिद्धि की हानि हो जाती है अर्थात् उसे सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती । यह पूर्ण रूप से सत्य है ।

विशेष

आम्भसी मुद्रा के लाभ में पूछा जा सकता है कि इसका मुख्य लाभ क्या होता है ? जिसका उत्तर है इससे साधक गहरे से गहरे पानी में भी नहीं डूबता अथवा उसकी कभी भी पानी में डूबने से मृत्यु नहीं होती है ।

आग्नेयी धारणा मुद्रा विधि वर्णन

मूल श्लोक · 3.75

यन्नाभिस्थितमिन्द्रगोपसदृशं बीजं त्रिकोणान्वितं तत्त्वं तेजमयं प्रदीप्तमरुणं रुद्रेण यत् सिद्धिदम् । प्राणांस्तत्र विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा कालगभीर भीतिहरणी वैश्वानरी धारणा ।। 75 ।।

भावार्थ

यह नाभि प्रदेश में स्थित मुद्रा है, जिसके कारण यह अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है । इसका रंग अग्नि के ही समान लाल होता है । यह त्रिकोण आकृति वाली है, जिसका बीजमन्त्र ‘रँ’ होता है । इस आग्नेयी मुद्रा का तत्त्व तेजमय अर्थात् सूर्य की तरह दीप्तिमान है । रुद्र इसके देवता कहे जाते हैं । इसका चक्र मणिपुर है , जो हमारी नाभि में ही स्थित होता है । चित्त के साथ अपने प्राणों को शरीर के अन्दर भरकर उसे पाँच घटी अर्थात् दो घण्टे तक अन्दर ही रोककर रखते हुए चित्त में स्थिर करें । इस प्रकार काल अर्थात् मृत्यु को दूर करने वाली इस मुद्रा को वैश्वानरी मुद्रा भी कहा जाता है ।

विशेष

परीक्षा से सम्बंधित कुछ आवश्यक प्रश्नों का वर्णन इस प्रकार है :- इस धारणा का तत्त्व कौनसा है ? उत्तर है अग्नि । इस धारणा का रंग कौनसा कहा गया है ? उत्तर है लाल । इसका बीज अक्षर क्या है ? उत्तर है ‘रँ’ । इस धारणा का सम्बंध किस चक्र से होता है ? उत्तर है मणिपुर चक्र । इस मुद्रा का देवता किसे माना गया है ? उत्तर है रुद्र । इस मुद्रा को किस अन्य नाम से जाना जाता है ? उत्तर है वैश्वानरी नाम से ।

आग्नेयी धारणा मुद्रा का फल

मूल श्लोक · 3.76

प्रदीप्ते ज्वलिते वह्नौ यदि पतित साधक: । एतन्मुद्राप्रसादेन स जीवति न मृत्युभाक् ।। 76 ।।

भावार्थ

आग्नेयी मुद्रा का अभ्यास करने वाला साधक यदि तेज जलती हुई अग्नि में भी गिर जाए तो भी वह इस मुद्रा के प्रभाव से जीवित रहता है अर्थात् अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती । तेज अग्नि में पड़ने पर भी उसकी मृत्यु नहीं होती है ।

विशेष

आग्नेयी मुद्रा से एक ही लाभ होता है कि अग्नि तत्त्व भी उसके शरीर को नहीं जला सकता । यह लाभ सुनने में अवश्य ही अटपटा सा लगता है ।  लेकिन यदि कुछ तत्थों पर विचार किया जाए तो यह सम्भव लगने लगेगा । आप सभी ने हमारे देश व अन्य देशों के बहुत सारे ऐसे इन्सानों को देखा होगा अथवा उनके बारे में सुना होगा कि वह नगें पैर जलती हुई अग्नि पर आसानी से चलते हैं । प्रचण्ड रूप से जलती हुई अग्नि भी उसके शरीर को नहीं जला पाती है । इस प्रकार के बहुत सारे वास्तविक वीडियो आपको यूट्यूब पर भी देखने को मिल जाएंगे । अतः इस साधना को करने से साधक के शरीर में वह सामर्थ्य आ जाता है कि वह अपने शरीर को अत्यधिक तापमान पर भी सुरक्षित रख सकता है । ठीक ऐसा ही वह अत्यधिक कम तापमान पर भी अपने शरीर को सन्तुलित कर लेते हैं । इसके लिए केवल अच्छे अभ्यास की आवश्यकता होती है ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Nice guru ji.

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।