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  • Gheranda Samhita Ch. 3 [61-63]

तडागी मुद्रा विधि व फल वर्णन

 

उदरं पश्चिमोत्तानं कृत्वा च तडागाकृतिम् ।

तडागी सा परामुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।। 61 ।।

 

भावार्थ :-  पश्चिमोत्तान आसन करके अपने उदर अर्थात् पेट को तालाब की आकृति के समान बना लेना तडागी मुद्रा कहलाती है । यह अति श्रेष्ठ मुद्रा बुढ़ापे ( वृद्धावस्था ) व मृत्यु का नाश करने वाली होती है ।

 

 

विशेष :-  इस मुद्रा के सम्बंध में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न एक ही हो सकता है कि तडागी शब्द का क्या अर्थ होता है या तडागी शब्द किसके लिए प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है तालाब । तडागी शब्द का अर्थ तालाब होता है । अपने पेट को तालाब की आकृति के समान बना लेने से ही इसे तडागी मुद्रा कहा जाता है ।

 

 

माण्डूकी मुद्रा विधि वर्णन

 

मुखं समुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत् ।

शनैर्ग्रसेदमृतं तन्माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ।। 62 ।।

 

भावार्थ :-  अपने मुहँ को बन्द करके अन्दर ही जीभ के मूलभाग को आगे- पीछे करते हुए उसका चालन करें और धीरे-धीरे चन्द्रमा से स्त्रावित ( टपकने ) होने वाले अमृत रस का पान करें अर्थात् उसे पीना चाहिए । विद्वानों ने इसे माण्डूकी मुद्रा कहा है ।

 

 

माण्डूकी मुद्रा का फल

 

वलितं पलितं नैव जायते नित्य यौवनम् ।

न केशे जायते पाको य: कुर्यान्नित्यमाण्डूकीम् ।। 63 ।।

 

भावार्थ :- जो साधक नित्य प्रति माण्डूकी मुद्रा का अभ्यास करता है, न तो उसकी त्वचा सिकुड़ती है ( इकट्ठी होना ) और न ही उसकी त्वचा पर कभी झुर्रियां पड़ती हैं । उसका यौवन सदा बना रहता है अर्थात् वह सदा जवान बना रहता है । साथ ही कभी भी उसके बाल सफेद नहीं होते है ।

 

 

विशेष :-  परीक्षा में इसके सम्बन्ध में पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा के अभ्यास से साधक की त्वचा पर झुर्रियां नहीं पड़ती और न ही त्वचा सिकुड़ती है ? जिसका उत्तर है माण्डूकी मुद्रा । या यह भी पूछा जा सकता है कि वलित और पलित नामक लाभ किस मुद्रा से प्राप्त होते हैं ? उत्तर है माण्डूकी मुद्रा ।

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