उदानजयाज्जलपङ्क कण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ।। 39 ।।
शब्दार्थ :- उदान ( उदान नामक प्राण के ) जयात् ( जीतने से ) जल ( पानी ) पङक ( कीचड़ ) कण्टक ( काँटें ) आदिषु ( इत्यादि ) असङ्ग ( से रहित हो जाता है) च ( और ) उत्क्रान्ति: ( वह उच्च या ऊर्ध्व गति प्राप्त करता है )
सूत्रार्थ :- उदान नामक प्राण पर विजय प्राप्त करने के बाद योगी जल, कीचड़ व काँटो के प्रभाव से रहित हो जाता है ।
व्याख्या :- इस सूत्र में उदान प्राण की सिद्धि का फल बताया गया है ।
सूत्र की व्याख्या में हम सबसे पहले प्राण के विषय में जान लेते हैं । जिससे सूत्र को समझने में आसानी होगी ।
प्राण मुख्य रूप से पाँच होते हैं । जिनके पाँच ही उपप्राण भी होते हैं । इस प्रकार कुल प्राणों की संख्या दस मानी जाती है । जो इस प्रकार हैं –
पाँच प्राण :-
नाम- स्थान- कार्य
- प्राण – छाती- श्वसन
- अपान – गुदा- निष्कासन
- समान – पेट- पाचन
- उदान – कण्ठ- निगलना
- व्यान – पूरा शरीर – संचरण ।
पाँच उपप्राण :-
- नाग
- कूर्म
- कृकल
- देवदत्त
- धनंजय
सभी प्राणियों के जीवन का आधार यह प्राण ही होता है । बिना प्राण के जीवन की कल्पना भी नहीं हो सकती । अतः हमारे सभी प्राचीन ग्रन्थों में प्राण को श्रेष्ठ व ज्येष्ठ कहकर सम्बोधित किया गया है ।
यह पाँच प्राण किस प्रकार हमारे शरीर में कार्य करते हैं ? इसका थोड़ा विस्तार से वर्णन इस प्रकार है ।
- प्राण :- प्राण सभी प्राणों में प्रमुख होता है । जिसका मुख्य कार्य श्वसन कार्य को सम्पादित ( पूरा ) करना होता है । यह हमारे हृदय प्रदेश से लेकर गले तक रहता है ।
- अपान :- यह अपान नामक प्राण हमारी नाभि से लेकर पैरों के तलुओं तक रहता है । जिसका कार्य मल- मूत्र व गर्भ आदि को शरीर से बाहर निकालना होता है ।
- समान :- समान नामक प्राण हमारे शरीर में हृदय से लेकर नाभि तक रहता है । जिसका मुख्य कार्य भोजन को पचा कर उसका समान रूप से वितरण करना होता है । शरीर के मध्य अर्थात बीच में स्थित होने के कारण भी इसको समान कहा जाता है ।
- उदान :- उदान नामक प्राण हमारे शरीर में कण्ठ अर्थात गले से लेकर सिर तक स्थित होता है । इसका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्ध्वगामी बनाना होता है । यह सभी खाद्य पदार्थों को निगलने का भी कार्य करता है ।
- व्यान :- व्यान नामक अन्तिम प्राण का स्थान हमारा पूरा शरीर होता है । यह प्राण पूरे शरीर में व्याप्त रहता है । यह शरीर में प्राण वायु व रक्त संचार को संचारित ( संचालन ) करने का कार्य करता है ।
इस प्रकार यह पाँच प्राण हमारे शरीर में अपने- अपने कार्यों का सम्पादन करते हैं ।
अब हम बात करते हैं उदान नामक प्राण की । उदान नामक प्राण को जीतने अर्थात उस पर पूर्ण अधिकार होने से योगी न ही तो जल में डूबता है, न ही कीचड़ में धंसता है और न उस पर काँटो का कोई प्रभाव ( असर ) होता है । अर्थात उसके शरीर में काँटो की चुभन का कोई प्रभाव नहीं होता ।
बहुत सारे भाष्यकार इस तथ्य से असहमति जताते हुए कहते हैं कि यह सम्भव नहीं है कि व्यक्ति पानी में न डूबे, न ही कीचड़ में धंसे और न ही उस पर काँटो का कोई असर हो ।
यहाँ हमें एक बात पर गौर करने की आवश्यकता है कि योग के आसनों में मत्स्यासन का नियमित अभ्यास करने वाले योगी साधक गहरे पानी में भी बिना किसी सहारे व प्रयास के आसानी से घण्टो तक पानी में तैरते रहते हैं । मैं स्वयं ऐसे बहुत सारे व्यक्तियों को जानता हूँ । जो घण्टो तक गंगा नदी में मत्स्यासन लगाकर पानी के ऊपर बिना प्रयास के तैरते रहते हैं ।
इसके अतिरिक्त हठ प्रदीपिका के आठ कुम्भको ( प्राणायाम ) में प्लाविनी नामक अन्तिम कुम्भक करने से मिलने वाले लाभ को बताते हुए कहा गया है कि इसके नियमित अभ्यास से व्यक्ति पानी में कमल के पत्ते के समान तैरता है । अतः यह बात सामान्य रूप से ही सिद्ध हो जाती है कि नियमित रूप से योगाभ्यास करने वाला योगी पानी में नहीं डूबता । ठीक इसी प्रकार प्राणायाम का प्रतिफल बताते हुए महर्षि घेरण्ड कहते हैं कि इससे शरीर में हल्कापन आता है । जब कोई योगी नियमित रूप से प्राणायाम का अभ्यास करता है तो उसका शरीर समान्य व्यक्ति के मुकाबले ज्यादा हल्का हो जाता है । जिससे उसके कीचड़ में धंसने की सम्भावना बहुत ही कम हो जाती है ।
इसके अलावा इस सूत्र में अन्तिम फल अर्थात काँटो के प्रभाव की बात कही गई है । जो योगसूत्र में आसन की सिद्धि द्वारा पूर्ण हो रही है । आसन की सिद्धि का फल बताते हुए कहा है कि आसन की सिद्धि होने पर साधक के सभी द्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं । द्वन्द्व का अर्थ है दुःख- सुख, गर्मी- सर्दी, आदि का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं होता । इस प्रकार आसन सिद्ध होने पर योगी के शरीर पर काँटो का प्रभाव नहीं होता ।
Thanku sir??
Pranaam Sir! ??understanding of the Sutra made easy by in detail explanation of Pranna and upprana
Bahot hi sunder vivechan.
Guru ji nice explain about benefit of udana prana.
ॐ गुरुदेव*
उदान नामक प्राण की सिद्धि के वर्णन के साथ ही साथ
आपने अन्य प्राणों के विषय में भी बताकर बहुत ही अनुग्रह किया है आपने ।So thank you so much for this.
??प्रणाम आचार्य जी! बहुत ही सुंदर वण॔न प्रान और उनके स्वरूप का आपने बताया है । इस सूत्र को बनाने मे विशेष बात यह है कि इस सूत्र मे उपस्थित सभी तथ्यो का तक॔ संगत वण॔न आपके द्वारा दिया गया है! इस सुंदर सूत्र को इतने गहराई से प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद श्रीमान जी! ओम?
Warchaswaniya