ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः ।। 31 ।। ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।। 32 ।।       व्याख्या :-   जो भी पुरुष मेरे द्वारा बताई गई बातों में दोष दृष्टि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक उनका पालन करता है, वह सभी प्रकार के कर्म बन्धनों से मुक्त

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [31-34]

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।। 35 ।।     व्याख्या :-  दूसरे के ज्यादा सुखकारी अथवा अच्छे दिखने वाले परधर्म से अपना कठिन व कम अच्छा दिखने वाला स्वधर्म ही ज्यादा कल्याणकारी होता है । अपने स्वयं के धर्म का पालन करते हुए मरना भी श्रेष्ठ है, परन्तु दूसरे के

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [35]

अर्जुन उवाच :-   अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ।। 36 ।।     व्याख्या :-  अब अर्जुन प्रश्न करते हुए कहता है :- हे वार्ष्णेय ! ( कृष्ण ) अब मुझे यह बताओ कि मनुष्य न चाहते हुए भी अपनी इच्छा के विरुद्ध, किसकी प्रेरणा से प्रेरित होकर

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [36-40]

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌ ।। 41 ।।     व्याख्या :-  इसलिए हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! सबसे पहले तुम अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करो और उसके बाद तुम ज्ञान – विज्ञान को नष्ट करने वाले इस कामरूपी पापी को भी नष्ट कर डालो ।       इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [41-43]

चौथा अध्याय ( ज्ञान – कर्म सन्यासयोग ) चौथे अध्याय में मुख्य रूप से कर्म व ज्ञान का उपदेश दिया गया है । इसमें कुल बयालीस ( 42 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । इस अध्याय के आरम्भ में ही श्रीकृष्ण योग की पुरातन परम्परा का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह

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Bhagwad Geeta Ch. 4 [1-3]

अर्जुन उवाच   अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।। 4 ।। व्याख्या :-  अब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा – हे कृष्ण आपका जन्म तो अभी का ( कुछ वर्ष पूर्व का ही ) है और विवस्वान ( सूर्य ) का जन्म तो अत्यंत प्राचीन अर्थात् बहुत पहले हो चुका,

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Bhagwad Geeta Ch. 4 [4-8]

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।। 9 ।।     व्याख्या :-  हे अर्जुन ! जो व्यक्ति मेरे दिव्य जन्म और कर्म के रहस्यों को तत्त्व रूप से जान लेता है, वह मृत्यु के बाद कभी भी पुनः जन्म नहीं लेता, बल्कि वह जन्म- मरण

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Bhagwad Geeta Ch. 4 [9-12]