Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 3 [36-40]
अध्याय 3: कर्मयोग
अर्जुन उवाच :-
मूल श्लोक · 3.36
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ।। 36 ।।
व्याख्या
अब अर्जुन प्रश्न करते हुए कहता है :- हे वार्ष्णेय ! ( कृष्ण ) अब मुझे यह बताओ कि मनुष्य न चाहते हुए भी अपनी इच्छा के विरुद्ध, किसकी प्रेरणा से प्रेरित होकर इस पाप कर्म में लग जाता है ?
श्रीभगवानुवाच :-
मूल श्लोक · 3.37
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ।। 37 ।।
व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि रजोगुण से उत्पन्न होने वाले काम व क्रोध ही मनुष्य को प्रेरणा देते हैं । तुम इस लोक में महाभक्षी व महापाप रूपी काम व क्रोध को ही अपना शत्रु समझो ।
विशेष
यहाँ पर काम शब्द का अर्थ केवल कामवासना अथवा यौन इच्छा ही नहीं है बल्कि सभी सांसारिक सुखों को भोगने की इच्छा को काम कहा गया है ।
मूल श्लोक · 3.38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ।। 38 ।।
व्याख्या
जैसे प्रकार धुएँ से अग्नि ( आग ), मैल से दर्पण ( शीशा ), व झिल्ली ( जेर ) से गर्भ ढके रहते हैं, वैसे ही इस काम रूपी आवरण से यह ज्ञान अथवा विवेक ढका रहता है ।
मूल श्लोक · 3.39
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ।। 39 ।।
व्याख्या
हे अर्जुन ! अग्नि की तरह कभी भी शान्त न होने वाले, ज्ञानी जनों के नित्य शत्रु इस काम से ही मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है ।
मूल श्लोक · 3.40
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।। 40 ।।
व्याख्या
इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि ही इस कामरूपी शत्रु का आश्रय स्थल अथवा निवास स्थान हैं । इनके सहयोग से यह काम रूपी शत्रु मनुष्य के विवेक ( ज्ञान ) को ढककर, उसे अपने वश में कर लेता है ।
ॐ गुरुदेव!
आपका हृदय से आभार।
Thanks sir
Nice guru ji.
Thank you sir