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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 3 [6-8]

अध्याय 3: कर्मयोग

मूल श्लोक · 3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।। 6 ।।

व्याख्या

जो मनुष्य अपनी कर्मेन्द्रियों ( हाथ- पैर आदि ) से विषयों ( इच्छाओं ) का त्याग कर देते हैं और मन ही मन उन सभी विषयों का चिन्तन- मनन करते रहते हैं । उन्हें इन्द्रियों के विषयों ( रूप, रस, गन्ध आदि ) का चिन्तन करने के कारण पाखण्डी अथवा झूठे आचरण वाला कहा जाता है ।

विशेष

इस श्लोक में उन व्यक्तियों के ऊपर कटाक्ष किया गया है जो दिखावे के लिए तो संयमी होते हैं । परन्तु वास्तव में उनके मन में सभी विषयों को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रहती है । ऐसे लोगों को मिथ्या आचरण वाला कहा जाता है । यह केवल कर्मेन्द्रियों का संयम ( बाहरी ) करते हैं । आन्तरिक रूप से यह पूरी तरह से विषयों में लिप्त अथवा आसक्त होते हैं ।

मूल श्लोक · 3.7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ।। 7 ।।

व्याख्या

किन्तु हे अर्जुन ! इन मिथ्या आचरण करने वालों मनुष्यों से वे मनुष्य बहुत अधिक श्रेष्ठ होते हैं, जो अपनी इन्द्रियों पर पूरी तरह से नियंत्रण करके, अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा निष्काम भाव ( आसक्ति रहित ) से कर्म करते हैं ।

विशेष

व्यक्ति को अपनी कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कार्यों का सम्पादन तो करना ही पड़ता है । लेकिन उसमें भाव सबसे महत्वपूर्ण होता है । जब भी कोई कार्य इन्द्रियों के वशीभूत होकर किया जाता है तो वह आसक्ति युक्त कर्म कहलाता है और इसके विपरीत जब भी कोई कार्य केवल कर्तव्य कर्म मानकर किया जाता है । तब वह कर्म निष्काम भाव से युक्त कर्म कहलाता है ।

मूल श्लोक · 3.8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ।। 8 ।।

व्याख्या

प्रत्येक व्यक्ति को अपने नित्य कर्मों को कर्तव्य की भावना से करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा तो कर्म करना ही श्रेष्ठ होता है । कर्म किये बिना तो इस शरीर का पालन - पोषण करना भी असम्भव हो जाएगा । अतः नियत कर्म करना ही मनुष्य के लिए हितकारी होता है ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about niskama karma.

  2. Mamta

    Thank you sir