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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 3 [31-34]

अध्याय 3: कर्मयोग

मूल श्लोक · 3.31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः ।। 31 ।।

मूल श्लोक · 3.32

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।। 32 ।।

व्याख्या

जो भी पुरुष मेरे द्वारा बताई गई बातों में दोष दृष्टि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक उनका पालन करता है, वह सभी प्रकार के कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाता है ।

इसके विपरीत जो अज्ञानी व्यक्ति मेरे द्वारा बताई गई बातों में दोष देखते हुए मेरी शिक्षाओं का पालन नहीं करते हैं, तुम उनकी बुद्धि को नष्ट हुई ही समझो ।

मूल श्लोक · 3.33

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।। 33 ।।

व्याख्या

सभी व्यक्ति अपनी- अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर ही कार्य करते हैं, फिर चाहे वह ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी । जब सभी व्यक्ति अपने - अपने स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करते हैं, तो इसमें किसी प्रकार का हठ अर्थात् जोर - जबरदस्ती क्या करेगी ?

विशेष

सभी व्यक्तियों का अपना - अपना स्वभाव होता है, उसी के अनुसार वह अपना व्यवहार करते हैं । ज्ञानी व्यक्ति अपने विवेकी स्वभाव व अज्ञानी व्यक्ति अपने अविवेकपूर्ण स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार करते हैं । किसी के साथ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती नहीं है ।

मूल श्लोक · 3.34

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।। 34 ।।

व्याख्या

प्रत्येक इन्द्रिय ( आँख, कान, नासिका, जिह्वा व त्वचा ) का अपने - अपने विषयों में राग ( लगाव ) व द्वेष ( कटुता ) स्वभाविक रूप से विद्यमान होतें हैं । ज्ञानी पुरुष को राग व द्वेष नामक दोनों ही दोषों से रहित होना चाहिए, क्योंकि यह दोनों ही दोष योग मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं ।

विशेष

इस श्लोक में राग व द्वेष नामक क्लेशों के विषय में बताते हुए कहा है कि ज्ञानी मनुष्य को इन दोषों से बचना चाहिए । इन दोनों दोषों ( राग - द्वेष ) को योग मार्ग में बाधक माना गया है ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Suman

    Thank you sir ???

  2. Aashish malhan

    Guru ji nice explain about avoid raga or devasa.