कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।। 6 ।। व्याख्या :- जो मनुष्य अपनी कर्मेन्द्रियों ( हाथ- पैर आदि ) से विषयों ( इच्छाओं ) का त्याग कर देते हैं और मन ही मन उन सभी विषयों का चिन्तन- मनन करते रहते हैं । उन्हें इन्द्रियों के विषयों …
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- Category: Bhagwad Geeta








