आसन की स्थिर स्थिति   समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ ।। 13 ।। प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।। 14 ।।       व्याख्या :-  अपने शरीर को आसन में स्थिर करके, कमर ( पीठ ), गर्दन व सिर को बिलकुल सीधी रखते हुए, अपनी

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [13-15]

योगी का आहार – विहार कैसा हो ?   नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।। 16 ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। 17 ।। यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ।। 18 ।।       व्याख्या :-   हे अर्जुन ! यह

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [16-18]

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ।। 19 ।।     व्याख्या :-  जिस प्रकार वायुरहित ( जहाँ पर वायु का आवागमन न हो ) स्थान पर रखे हुए दीपक की ज्योति अर्थात् लौ निश्चल अर्थात् स्थिर होती है, वैसी ही निश्चल अथवा स्थिर अवस्था संयमित चित्त वाले योगी साधक

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [19-22]

योग की परिभाषा   तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 23 ।।     व्याख्या :-  दुःख के संयोग से रहित अर्थात् सुख स्वरूप अवस्था को ही योग कहा जाता  है । योगी साधक को इस योग का अभ्यास उत्साहित मन व पूर्ण निश्चय अथवा मनोयोग के साथ करना चाहिए ।

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [23-26]

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ । उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ।। 27 ।।     व्याख्या :-  इस प्रकार चंचल मन को एकाग्र करके अपनी आत्मा के अधीन करने से मन पूरी तरह से शान्त होकर निष्पाप अर्थात् पाप रहित हो जाता है । मन के शान्त होने पर साधक का रजोगुण भी शान्त हो जाएगा, जिससे

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [27-30]

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ।। 31 ।।       व्याख्या :-  इस प्रकार एकात्म भाव में स्थित हुआ पुरुष जब सभी प्राणियों में मुझे ही भजता अर्थात् मेरा ही भजन करता है, तो वह सभी सांसारिक कार्य करता हुआ भी मेरे लिए ही कार्य करता है अर्थात्

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [31-34]

श्रीभगवानुवाच   मन को नियंत्रण में करने के उपाय   अभ्यास और वैराग्य   असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।। 35 ।।     व्याख्या :-  भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं – हे महाबाहो ! निःसन्देह इस चंचल मन को नियंत्रण ( वश ) में करना अत्यन्त

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [35-36]