मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेष: ।। 22 ।।   शब्दार्थ :- मृदु, ( साधारण या कम प्रयास करने वाला ) मध्य, ( कम से थोड़ा ज्यादा / मध्यम प्रयास करने वाला ) अधि, ( अधिक या ज्यादा प्रयास करने वाला ) मात्रत्वात्, ( मात्रा वाला ) तत:, ( उससे ) अपि, ( भी ) विशेष, ( विशिष्ट /

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Yoga Sutra – 22

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ।। 23 ।।   शब्दार्थ :- वा, ( इसके अतिरिक्त ) ईश्वरप्रणिधानात्  ( ईश्वर / भगवान के प्रति समर्पण भाव से भी ) समाधि की सिद्धि अति शीघ्रता से होती है।   सूत्रार्थ :- पूर्व में वर्णित तीव्र संवेग वाले साधकों के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति समर्पण भाव  करने से भी समाधि व समाधि

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Yoga Sutra – 23

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर: ।। 24 ।।   शब्दार्थ :- क्लेश, ( अविद्या आदि पञ्च क्लेशों ) कर्म, ( शुभ- अशुभ मिश्रित कर्मों  ) विपाक, ( कर्मों के फलों ) आशयै:, (भोगों के संस्कारों से ) अपरामृष्ट:, ( सम्पर्क रहित, सम्बध रहित ) पुरुषविशेष, ( पुरुषों से विशिष्ट चेतना वाला ) ईश्वर ( वह ईश्वर है

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Yoga Sutra – 24

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ।। 25 ।।   शब्दार्थ :-  तत्र, ( उस ईश्वर में ) सर्वज्ञबीजम्, ( सर्वज्ञता का कारण अर्थात ज्ञान ) निरतिशयम् ( सबसे ऊँचा / सर्वोच्च है । )   सूत्रार्थ :- उस ईश्वर में सब कुछ ( मूल रूप में ) जानने का जो ज्ञान है वह सबसे ज्यादा या सर्वोच्च 

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Yoga Sutra – 25

स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ।। 26 ।।   शब्दार्थ :- स एष, ( वह ईश्वर ) पूर्वेषाम्, ( पहले उत्पन्न हुए सभी गुरुओं का ) अपि, ( भी ) गुरु, ( ज्ञान देने वाला / विद्या देने वाला है । ) कालेन, ( काल अर्थात समय की ) अनवच्छेदात्, ( सीमा / बाध्यता से

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Yoga Sutra – 26

तस्य वाचक: प्रणव: ।। 27 ।। शब्दार्थ :- तस्य, ( उस ईश्वर का ) वाचक:, ( बोला जाने वाला नाम ) प्रणव:, ( ओ३म् / ओम् है । )   सूत्रार्थ :- उस ईश्वर  का बोधक  अर्थात ज्ञान करवाने वाला नाम ओ३म् / ओम्  है ।   व्याख्या :- इस सूत्र में ईश्वर के वाचक

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Yoga Sutra – 27

तज्जपस्तदर्थभावनम् ।। 28 ।।   शब्दार्थ :- तज्जप:, ( उस ओ३म् नाम का जप / उच्चारण ) तदर्थभावनम् , ( उसके नाम का अर्थ सहित चिन्तन / मनन करना ) । सूत्रार्थ :- उस ईश्वर के वाचक नाम ( ओ३म् ) का उच्चारण या जप उसके अर्थ सहित चिन्तन के साथ करना चाहिए ।  

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Yoga Sutra – 28