सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ।। 36 ।।   शब्दार्थ :- सत्य- प्रतिष्ठायां ( सत्य अर्थात सच के सिद्ध हो जाने पर ) क्रियाफल-आश्रयत्वम् ( योगी के कहे हुए कथनों या वचनों के फल का प्रभाव अन्यों या दूसरों के ऊपर भी पड़ता है । )   सूत्रार्थ :- जब योगी मन, वचन व कर्म से सत्य को

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Yoga Sutra 2 – 36

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नो पस्थानम् ।। 37 ।।   शब्दार्थ :- अस्तेय- प्रतिष्ठायां ( चोरी के भाव का पूरी तरह से अभाव होने पर अर्थात चोरी के भाव से पूरी तरह से मुक्ति प्राप्त होने पर ) सर्वरत्नो- पस्थानम् ( सभी प्रकार के उत्तम से उत्तम रत्न अर्थात पदार्थ प्रकट होते हैं । )   सूत्रार्थ :-

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Yoga Sutra 2 – 37

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।। 38 ।।   शब्दार्थ :- ब्रह्मचर्य- प्रतिष्ठायां ( ब्रह्मचर्य के पूर्ण रूप से सिद्ध होने पर ) वीर्यलाभः ( सामर्थ्य अर्थात बल की प्राप्ति होती है । )   सूत्रार्थ :- ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह से पालन करने से साधक को अनन्त सामर्थ्य अर्थात शारीरिक व मानसिक बल की प्राप्ति होती

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Yoga Sutra 2 – 38

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोध: ।। 39 ।।   शब्दार्थ :- अपरिग्रह ( अनावश्यक वस्तुओं व विचारों के त्याग की स्थिति ) स्थैर्ये ( स्थिर अथवा सिद्ध होने पर ) जन्म ( जीवन से सम्बंधित ) कथन्ता ( कथा या कहानी ) सम्बोध: ( ज्ञान या जानकारी हो जाती है )   सूत्रार्थ :- अनावश्यक वस्तुओं व विचारों

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Yoga Sutra 2 – 39

शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्ग: ।। 40 ।।   शब्दार्थ :- शौचत् ( शुद्धि के सिद्ध होने पर ) स्व ( स्वयं यानी अपने ) अङ्ग ( अंगो अर्थात शरीर के हिस्सों से ) जुगुप्सा ( घृणा या विरक्ति ) परै: ( तथा दूसरों के शरीर से भी ) असंसर्ग: ( सम्पर्क या सम्बन्ध बनाने की इच्छा नहीं

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Yoga Sutra 2 – 40

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय जयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ।। 41 ।।   शब्दार्थ :- च ( और ) सत्त्वशुद्धि ( बुद्धि की शुद्धि ) सौमनस्य ( मन की सौम्यता अर्थात प्रसन्नता ) एकाग्र्य ( मन की स्थिरता या एकाग्रता ) इन्द्रियजय ( कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण ) आत्मदर्शन ( आत्म -साक्षात्कार की ) योग्यत्वानि ( योग्यता आती है )

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Yoga Sutra 2 – 41

सन्तोषादनुत्तमसुखलाभ: ।। 42 ।।   शब्दार्थ :- सन्तोषात् ( पूर्ण संतुष्टि से ) अनुत्तम ( सबसे उत्तम अर्थात सर्वश्रेष्ठ ) सुखलाभः ( सुख की प्राप्ति होती है । )   सूत्रार्थ :- सन्तोष अर्थात संतुष्टि का पूरी तरह से पालन करने से साधक को सभी सुखों से उत्तम अर्थात सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है

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Yoga Sutra 2 – 42