ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ।। 8 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उन अर्थात अन्य तीन प्रकार के कार्यों से ) तद् ( उन ) विपाक ( कर्मों के फल ) अनुगुणानाम् ( भोगों के अनुसार ) एव ( ही ) वासनानाम् ( वासनाएँ अर्थात संस्कार ) अभिव्यक्ति: ( प्रकट अथवा उत्पन्न होती हैं )     सूत्रार्थ

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Yoga Sutra 4 – 8

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ।। 9 ।।   शब्दार्थ :- जाति ( विशेष समूह ) देश ( स्थान ) काल ( समय के ) व्यहितानाम् ( व्यवधान या अन्तर होने पर ) अपि ( भी ) स्मृति ( याददाश्त और ) संस्कारयो: ( कर्म संस्कारों के ) एकरूपत्वात् ( एक समान या एक ही विषय होने से

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Yoga Sutra 4 – 9

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ।। 10 ।।   शब्दार्थ :- आशिष: ( जीवित रहने की इच्छा का ) नित्यत्वात् ( सदा बने रहने से ) तासाम् ( उन सभी संस्कारों अथवा वासनाओं का ) अनादित्वं ( प्रवाह आदि काल से ) च ( ही है )     सूत्रार्थ :- जीवन को जीने की लालसा या

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Yoga Sutra 4 – 10

हेतुफलाश्रयालम्बनै: संगृहीतत्वादेषामभावे तदभाव: ।। 11 ।।   शब्दार्थ :- हेतु ( कारण ) फल ( परिणाम ) आश्रय ( शरण ) आलम्बनै: ( अभिव्यक्ति से ही ) संगृहीतत्वात् ( वासनाओं का संग्रहण अथवा एक जगह इकट्ठा करना से ) एषाम् ( इन अर्थात उपर्युक्त चार कारणों के ) अभावे ( न होने से अर्थात इन

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Yoga Sutra 4 – 11

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद् धर्माणाम् ।। 12 ।।   शब्दार्थ :- धर्माणाम् ( धर्मों के अर्थात पदार्थ की विशेषताओं का ) अध्व ( काल अर्थात समय के ) भेदात् ( भेद अर्थात अन्तर से ) अतीत ( भूतकाल अर्थात जो बीत चुका ) अनागतम् ( भविष्य अर्थात आने वाला समय में ) स्वरूपत: ( पदार्थ या वस्तुएँ

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Yoga Sutra 4 – 12

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मान: ।। 13 ।।   शब्दार्थ :- ते ( वे अर्थात वह तीनों कालों में विद्यमान रहने वाले सभी पदार्थ ) व्यक्त ( प्रकट अर्थात प्रत्यक्ष ) सूक्ष्मा: ( छिपे हुए अर्थात अप्रत्यक्ष रूप में ) गुणात्मान: ( गुण रूप में मौजूद होते हैं )     सूत्रार्थ :- तीनों कालों में विद्यमान

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Yoga Sutra 4 – 13

परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ।। 14 ।।   शब्दार्थ :- परिणाम ( परिणाम अर्थात फल के ) एक्त्वाद् ( एक होने से ) वस्तु ( वस्तु अथवा पदार्थ में ) तत्त्वम् ( एकत्व अर्थात एक समान भाव आ जाता है )     सूत्रार्थ :- परिणाम एक ही प्रकार का होने से वस्तु या पदार्थ में भी उसी

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Yoga Sutra 4 – 14