ऊर्ध्वजिह्व: स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति य: ।

मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ।। 44 ।।

 

भावार्थ :- जो भी योग साधक अपनी जीभ को ऊपर की ओर उठाकर स्वयं को स्थिर करते हुए ऊपर ( व्योमचक्र ) से टपकते हुए अमृत का पान ( पीता ) करता है । वह मात्र पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के ऊपर विजय प्राप्त कर लेता है । इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है ।

 

नित्यं सोमकला पूर्णं शरीरं यस्य योगिन: ।

तक्षकेणापि दष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ।। 45 ।।

 

भावार्थ :- जिस योगी साधक का शरीर सदैव उस सोमरूपी अमृत से भरा रहता है । उसका शरीर भयंकर विष के प्रभाव से भी रहित हो जाता है अर्थात् अत्यंत जहरीले सर्प द्वारा काटने पर भी उसके शरीर में जहर नहीं फैलता ।

 

इन्धनानि यथा वह्निस्तैलवर्ति च दीपक: ।

तथा सोमकलापूर्णं देही देहं न मुञ्चति ।। 46 ।।

 

भावार्थ :- जिस तरह अग्नि इन्धन को छोड़ती, दीपक की लौ तेल से भीगी बत्ती को नहीं छोड़ता । ठीक उसी प्रकार सोमरूपी अमृत से भरे हुए शरीर को आत्मा नहीं छोड़ती अर्थात् वह साधक मृत्यु को जीत लेता है ।

 

 

गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् ।

कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलघातका: ।। 47 ।।

गोशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि ।

गोमांस भक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ।। 48 ।।

 

भावार्थ :- जो साधक प्रतिदिन गोमांस को खाता है और दैवीसुरा अर्थात अमृत को पीता है । उसे मैं अच्छे कुल का मानता हूँ और अन्य सभी तो कुल का नाश करने वाले होते हैं । यहाँ पर गो शब्द का अर्थ है जीभ और तालु प्रदेश में उसका प्रवेश करने का अर्थ भक्षण ( खाना ) हैं । यह गोमांस भक्षण अर्थात् जिह्वा को तालु प्रदेश में प्रवेश करवाने से साधक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । यह सभी पापों का नाश करता है ।

 

विशेष :- यहाँ इस श्लोक में गोमांस भक्षण शब्द का प्रयोग किया गया है । जिसमें गो शब्द का अर्थ जीभ का पर्यायवाची है और उस जीभ का तालु प्रदेश में प्रवेश करना मास को खाने का पर्यायवाची है । इसका अर्थ गाय का मास खाना बिलकुल भी नहीं है । गाय के मास को योग शास्त्र में निषेध तथा घोर निन्दनीय बताया है ।

 

 

जिह्वाप्रवेशसम्भूतवह्निनोत्पादित: खलु ।

चन्द्रात् स्त्रवति य: सार: सा स्यादमरवारुणी ।। 49 ।।

 

भावार्थ :- जब साधक खेचरी मुद्रा का अभ्यास करते हुए अपनी जीभ को तालु प्रदेश में प्रवेश करवाता है तो उससे गर्मी उत्पन्न होती है । उस गर्मी से तालु के मूल भाग में से एक प्रकार का रस निकलता है । जिसे अमर वारुणी अर्थात् मृत्यु पर विजय प्राप्त करवाने वाला अमृत कहा गया है ।

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