खेचरी मुद्रा के लाभ

 

रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठति ।

विषैर्विमुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभि: ।। 38 ।।

 

भावार्थ :- जो साधक अपनी जीभ को ऊपर ले जाकर दोनों भौहों के बीच में आधे क्षण भी लगाकर रखता है तो वह अनेक प्रकार के विषों, रोगों, मृत्यु व बुढ़ापे आदि से मुक्त हो जाता है । यह सभी बाधाएँ उसे प्रभावित नहीं कर पाती हैं ।

 

न रोगो मरणं तन्द्रा न निद्रा न क्षुधा तृषा ।

न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ।। 39 ।।

 

भावार्थ :- खेचरी मुद्रा का अभ्यास करने वाले साधक को न तो कभी कोई रोग होता है, न उसकी मृत्यु होती है, न उसमें मानसिक शिथिलता आती है, न उसे नींद बाधित करती है, न उसे कभी भूख- प्यास परेशान करती है और न ही उसे कभी बेहोशी आती है ।

 

 

पीड्यते न स रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ।

बाध्यते न स कालेन यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ।। 40 ।।

 

भावार्थ :- खेचरी को जानने वाला साधक कभी भी रोगों से पीड़ित नहीं होता । न वह कर्मों के बन्धन में फंसता है और न ही उसे कभी मृत्यु अपने वश में कर पाती है ।

 

चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता ।

तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ।। 41 ।।

 

भावार्थ :- इस खेचरी मुद्रा का अभ्यास करने से साधक का चित्त हृदय आकाश में स्थित हो जाता है अर्थात् वह शून्य भाव में रहता है । जीभ व्योमचक्र में स्थित हो जाती है । इसलिए सिद्ध योगी इसे खेचरी मुद्रा कहते हैं ।

 

बिन्दु ( वीर्य ) पर पूर्ण नियन्त्रण

 

खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वत: ।

न तस्य क्षरते बिन्दु: कामिन्याश्लेषितस्य च ।। 42 ।।

चलितोऽपि यदा बिन्दु: सम्प्राप्तो योनिमण्डलम् ।

व्रजत्यूर्ध्वं हृत: शक्तया निबद्धो योनिमुद्रया ।। 43 ।।

 

भावार्थ :- जिस भी साधक ने खेचरी मुद्रा के अभ्यास द्वारा अपने तालु प्रदेश में स्थित व्योमचक्र के छिद्र को बन्द कर दिया है । उसका बिन्दु अर्थात् वीर्य अत्यन्त कामुक ( काम वासना से परिपूर्ण ) स्त्री के आलिङ्गन करने पर भी स्खलित ( बाहर / नष्ट ) नहीं होता । और यदि वह वीर्य स्खलित होकर स्त्री की योनि में पहुँच भी जाए तो भी साधक द्वारा योनिमुद्रा की शक्ति से उसे पुनः ऊपर खींच लिया जाता है ।

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  1. इस मुद्रा का ज्ञान देने के लिए मेरे आदर्श आचार्य का बहुत बहुत आभार।?

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