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  • Gheranda Samhita Ch. 7 [16-17]

राजयोग समाधि वर्णन

 

मनोमूर्च्छां समासाद्य मन आत्मनि योजयेत् ।

परमात्मन: समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ।। 16 ।।

 

भावार्थ :-  साधक मनोमूर्च्छा की साधना करके अपने मन को आत्मा में केन्द्रित करे । इस प्रकार मन का परमात्मा से संयोग ( मिलन ) होने पर साधक को समाधि की प्राप्ति हो जाती है । यह राजयोग समाधि कहलाती है ।

 

 

विशेष :-  राजयोग की समाधि किसके द्वारा होती है ? उत्तर है मनोमूर्च्छा द्वारा ।

 

 

समाधि की उपयोगिता

 

इति ते कथितश्चण्ड! समाधिर्मुक्तिलक्षणम् ।

राजयोगसमाधि: स्यादेकात्मन्येव साधनम् ।

उन्मनी सहजावस्था सर्वे चैकात्मवाचका: ।। 17 ।।

 

भावार्थ :-  हे चण्डकापालिक! इस प्रकार मैंने तुम्हें मुक्ति प्राप्त करवाने वाली समाधि के लक्षण बताये हैं । मन व आत्मा में एकरूपता करवाने वाले साधन ही समाधि कहलाते हैं । राजयोग समाधि, उन्मनी अवस्था या सहजावस्था यह सभी एक ही समाधि के पर्यायवाची शब्द हैं ।

 

 

विशेष :-  समाधि के पर्यायवाची किनको माना गया है ? उत्तर है राजयोग, उन्मनी अवस्था व सहजावस्था को ।

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