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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 5 [86-91]

अध्याय 5: प्राणायाम

विभिन्न कार्यों के समय वायु की दूरी

मूल श्लोक · 5.86

षण्णवत्यङ्गुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् । देहाद्बहिर्गतो वायु: स्वभावाद् द्वादशाङ्गुलि: ।। 86 ।।

मूल श्लोक · 5.87

गायने षोडशाङ्गुल्यो भोजने विंशतिस्तथा । चतुर्विंशाङ्गुलि: पस्थे निद्रायां त्रिंशदङ्गुलि: । मैथुने षट्त्रिंशद् व्यायामे च ततोधिकम् ।। 87 ।।

मूल श्लोक · 5.88

स्वभावेऽस्य गतेर्न्यूने परमायु: प्रवर्धते । आयु: क्षयोऽधिके प्रोक्तो मारुते चान्तराद्गते ।। 88 ।।

भावार्थ

सभी कर्मों के आधार इस शरीर की लम्बाई छियानवें अँगुल ( यह लम्बाई व्यक्ति की स्वयं की अँगुलियों के अनुसार होती है ) होती है । सामान्यतः शरीर से बाहर निकलते हुए इसकी लम्बाई या दूरी बारह अँगुल ( 12 ) होती है ।

किसी भी प्रकार का गायन अर्था गाना गाते हुए इसकी लम्बाई सोलह अँगुल ( 16 ) होती है, भोजन करते समय यह दूरी बीस अँगुल ( 20 ) हो जाती है । पैदल चलते हुए इसकी दूरी चौबीस अँगुल ( 24 ) होती है, नींद के समय यह दूरी तीस अँगुल ( 30 ) होती है । सम्भोग क्रिया करते हुए यह दूरी और भी ज्यादा अर्थात् छत्तीस अँगुल ( 36 ) हो जाती है व शारीरिक व्यायाम करते समय यह दूरी और भी ज्यादा हो जाती है ।

इस प्रकार स्वभाविक रूप से वायु की गति अर्थात् दूरी कम होने पर आयु अधिक ( लम्बी ) होती है और यह गति अर्थात् दूरी जितनी अधिक होगी उतनी ही मनुष्य की आयु की हानि ( आयु घट जाएगी ) होगी ।

विशेष

यहाँ पर पहले वायु की गति या दूरी को समझना जरूरी है तभी इस श्लोक का अर्थ समझा जा सकता है । वायु की गति या दूरी का अर्थ होता है जब हम श्वास को शरीर के बाहर छोड़ते हैं । तब उस वायु का प्रभाव जितनी दूर तक होता है वही उसकी दूरी अथवा गति होती है । इसको मापने के लिए हम अपनी नासिका के सामने एक हल्की रुई ( कपास का शोधित रूप ) का टुकड़ा रखें और प्राणवायु को बाहर छोड़ें । अब जहाँ तक वह रुई का टुकड़ा हिलता रहेगा वहीं तक आपके वायु की दूरी कहलाती है । इस दूरी को स्वयं की अँगुलियों के द्वारा मापा जाता है । जब हम तेज गति से श्वास लेते व छोड़ते हैं तो यह दूरी बढ़ जाती है और जैसे ही हम लम्बी वगहरी श्वास लेते व छोड़ते हैं तब यह दूरी कम हो जाती है ।

अब इससे सम्बंधित कुछ प्रश्नों का वर्णन भी करते हैं जो परीक्षा में पूछे जा सकते हैं ।

व्यक्ति की लम्बाई कितने अँगुल होती है ? उत्तर है स्वयं ( खुद ) की छियानवें अँगुल ( 96 ) । हमारी श्वास की बाहर निकलते हुए सामान्यतः दूरी कितनी अँगुल होती है ? उत्तर बारह अँगुल ( 12 ) । गायन में वायु की दूरी कितनी होती है ? उत्तर सोलह अँगुल ( 16 ) । बीस अँगुल ( 20 ) की दूरी किस कार्य के समय होती है ? उत्तर है भोजन के समय । चलते समय वायु की गति क्या होती है ? उत्तर है चौबीस अँगुल ( 24 ) । नींद के समय वायु की कितनी दूरी होती है ? उत्तर है तीस अँगुल ( 30 ) । सम्भोग के समय वायु की दूरी ? उत्तर छत्तीस अँगुल ( 36 ) । सबसे ज्यादा दूरी वायु की किस कार्य के समय होती है ? उत्तर है शारीरिक व्यायाम करते हुए ।

मूल श्लोक · 5.89

तस्मात् प्राणे स्थिते देहे मरणं नैव जायते । वायुना घट सम्बन्धे भवेत् केवलकुम्भकम् ।। 89 ।।

मूल श्लोक · 5.90

यावज्जीवो जपेन्मन्त्रमजपासङ्ख्यकेवलम् । अद्यावधि धृतं सङ्ख्याविभ्रमं केवलीकृते ।। 90 ।।

भावार्थ

जब तक हमारे शरीर में प्राणवायु स्थित रहती है तब तक हमारी मृत्यु नहीं हो सकती । जब वायु का शरीर से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है अर्थात् जब वायु शरीर में स्थिर हो जाती है तब वह अवस्था केवल कुम्भक की होती है ।

जब तक मनुष्य जीवित रहता है तब तक उसे उस अजपा जप गायत्री के निर्धारित जप का निरन्तर जप करते रहना चाहिए । जिसकी अब तक कि निर्धारित संख्या इक्कीस हजार छ: सौ बताई गई है । केवल कुम्भक प्राणायाम के द्वारा ही इस संख्या में परिवर्तन किया जा सकता है ।

मूल श्लोक · 5.91

अत एव हि कर्तव्य: केवलीकुम्भको नरै: । केवली चाजपासङ्ख्या द्विगुणा च मनोन्मनी ।। 91 ।।

भावार्थ

अतः मनुष्य को पूरी जिम्मेदारी के साथ केवली कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए । केवली कुम्भक व मनोन्मनी अवस्था ( समाधि ) से इस अजपा जप से दो गुणा अधिक लाभ प्राप्त होता है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about kavli and manomani samadi.

  2. Mamta

    Thanks again sir

  3. Lata baisane

    नयी जानकारी प्राप्त हुई। धन्यवाद।

  4. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।

  5. Dr.DeshBandhu

    Nice