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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [18-24]

अध्याय 3: मुद्रा

महाबन्ध वर्णन

मूल श्लोक · 3.18

वामपादस्य गुल्फेन पायुमूलं निरोधयेत् । दक्षपादेन तद्गुल्फं संपीड्य यत्नतः सुधी: ।। 18 ।।

मूल श्लोक · 3.19

शनै: शनैश्चालयेत् पार्ष्णिं योनिमाकुञ्चयेच्छन: । जालन्धरे धारयेत् प्राणं महाबन्धो निगद्यते ।। 19 ।।

भावार्थ

बायें पैर की एड़ी से गुदामार्ग को दबाकर उसका निरोध करते हुए दायें पैर की एड़ी से योनिस्थान को प्रयास पूर्वक दबाएं । इसके बाद धीरे- धीरे से गुदास्थान व योनिस्थान का आकुंचन ( उसे सिकोड़ें ) करे । इसके साथ ही प्राणवायु को शरीर के अन्दर रोकते हुए जालन्धर बन्ध लगाएं । इस विधि को महाबन्ध कहा गया है ।

विशेष

ऊपर वर्णित महाबन्ध की विधि में मूलबन्ध व जालन्धर बन्ध की विधियाँ ही प्रयोग की गई हैं । उड्डीयान बन्ध का इसमें प्रयोग नहीं किया गया है ।

महाबन्ध फल

मूल श्लोक · 3.20

महाबन्ध: परो बन्धो जरामरणनाशन: । प्रसादादस्य बन्धस्य साधयेत् सर्ववाञ्छितम् ।। 20 ।।

भावार्थ

महाबन्ध मुद्रा के अभ्यास से बुढ़ापा व मृत्यु का नाश होता है । महाबन्ध को सभी बन्धों में श्रेष्ठ माना गया है । इस मुद्रा के प्रभाव से साधक की सभी इच्छाएँ ( कामनाएँ ) पूर्ण होती हैं ।

विशेष

महाबन्ध मुद्रा मृत्यु व बुढ़ापा दोनों का नाश करता है । इसे केवल सभी बन्धों में श्रेष्ठ माना गया है न कि सभी मुद्राओं में । इससे साधक की सभी कामनाएँ भी पूर्ण होती हैं । यह सब परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है ।

महावेध की उपयोगिता

मूल श्लोक · 3.21

रूपयौवनलावण्यं नारीणां पुरुषं विना । मूलबन्धमहाबन्धौ महावेधं विना तथा ।। 21 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार पुरुष के बिना नारी के रूप ( सुन्दर रंग ), यौवन ( जवानी ) व लावण्य ( मनमोहक सुंदरता ) का का कोई महत्त्व नहीं है अर्थात् पुरुष के बिना यह सब निरर्थक होता है । ठीक उसी प्रकार महावेध मुद्रा के बिना मूलबन्ध व महाबन्ध का कोई महत्त्व नहीं है अर्थात् महावेध के बिना मूलबन्ध व महाबन्ध का अभ्यास करना निरर्थक है ।

विशेष

इस श्लोक में महावेध मुद्रा के महत्त्व को बताया गया है । परीक्षा की दृष्टि से यह पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा का अभ्यास किये बिना मूलबन्ध व महाबन्ध मुद्रा को निरर्थक अथवा फलहीन बताया गया है ? जिसका उत्तर है महावेध मुद्रा ।

महावेध मुद्रा विधि

मूल श्लोक · 3.22

महाबन्धं समासाद्य उड्डानकुम्भकं चरेत् । महावेध: समाख्यातो योगिनां सिद्धिदायक: ।। 22 ।।

भावार्थ

पहले साधक महाबन्ध मुद्रा की स्थिति में बैठे इसके बाद उड्डीयान बन्ध को लगाते हुए कुम्भक ( प्राणवायु को बाहर रोकें ) का अभ्यास करें । इस प्रकार यह महावेध मुद्रा कहलाती है । जो योगियों को सिद्धि प्रदान करती है ।

विशेष

महावेध मुद्रा में उड्डीयान बन्ध, जालन्धर बन्ध व मूलबन्ध तीनों बन्धों का प्रयोग किया जाता है । परीक्षा में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा में तीनों बन्ध एक साथ लगाए जाते हैं ? जिसका उत्तर है महावेध मुद्रा ।

महावेध मुद्रा का फल

मूल श्लोक · 3.23

महाबन्धमूलबन्धौ महावेध समन्वितौ । प्रत्यहं कुरुते यस्तु स योगी योगवित्तम: ।। 23 ।।

मूल श्लोक · 3.24

न मृत्युतो भयं तस्य न जरा तस्य विद्यते । गोपनीय: प्रयत्नेन वेधायं योगिपुङ्गवै: ।। 24 ।।

भावार्थ

जो योग साधक प्रतिदिन मूलबन्ध व महाबन्ध के साथ महावेध मुद्रा का अभ्यास करता है, वह योग का ज्ञानी अथवा श्रेष्ठ योगी कहलाता है । जिसे न तो कभी बुढ़ापा सताता है और न ही वह कभी मृत्यु से भयभीत होता है । तभी सभी श्रेष्ठ योगियों ने महावेध मुद्रा की विधि को प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखने की बात कही है ।

विशेष

महावेध मुद्रा करने वाले योगी को श्रेष्ठ योगी माना गया है । इसके अलावा यह मुद्रा बुढ़ापा व मृत्यु के प्रभाव को खत्म कर देती है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Neelam

    Nice

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    अत्यंत ही उत्तम व्याख्या ।

    आपको हृदय से आभार।

  3. Lata Baisane

    धन्यवाद।

  4. Aashish malhan

    Nice guru ji.