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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 1 [36-42]

अध्याय 1: षट्कर्म

हृदय धौति के प्रकार

मूल श्लोक · 1.36

हृद्धौतिं त्रिविधां कुर्याद्दण्डवमनवाससा ।। 36 ।।

भावार्थ

हृदय धौति को तीन प्रकार से किया जाता है :- 1. दण्ड ( दण्डधौति ), 2. वमन ( वमन धौति ), 3. वास ( वस्त्र धौति ) ।

दण्ड धौति विधि

मूल श्लोक · 1.37

रम्भादण्डं हरिद्दन्डं वेत्रदण्डं तथैव च । हृन्मध्ये चालयित्वा तु पुनः प्रत्याहरेच्छनै: ।। 37 ।।

भावार्थ

केले के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग से, हल्दी के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग से या फिर वेंत के पत्तों के बीच के कोमल ( पाइपनुमा ) भाग को हृदय प्रदेश के बीच तक ( छाती के दोनों हिस्सो के बीचोंबीच ) ले जाकर पुनः उसे धीरे से बाहर निकालना दण्डधौति कहलाता है ।

विशेष

दण्डधौति में बताई गई विधि को अच्छी प्रकार से समझने के लिए विद्यार्थी चित्र की सहायता ले सकते हैं । आजकल दण्डधौति के स्थान पर रबड़ की पाइप का प्रयोग किया जाता है । जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता ।

दण्ड धौति लाभ

मूल श्लोक · 1.38

कफपित्तं तथा क्लेदं रेचये दूर्ध्ववर्त्मना । दण्डधौतिविधानेन हृद्रोगं नाशयेद् ध्रुवम् ।। 38 ।।

भावार्थ

दण्डधौति के अभ्यास से साधक के अन्दर कफ, पित्त व क्लेद ( दूषित चिपचिपा पदार्थ ) आदि की बढ़ी हुई मात्रा को शरीर के ऊपरी मार्ग ( मुहँ द्वारा ) बाहर निकाल दिया जाता है । जिससे साधक के हृदय से सम्बंधित सभी रोग निश्चित रूप से समाप्त हो जाते हैं ।

विशेष

दण्डधौति से साधक के शरीर में कफ, पित्त व क्लेद ( दूषित चिपचिपा पदार्थ ) की अधिकता समाप्त हो जाती है । जिससे शरीर में इन सभी से सम्बंधित होने वाले रोगों की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है ।

वमन धौति विधि व लाभ

मूल श्लोक · 1.39

भोजनान्ते पिबेद्वारि चाकण्ठ पूरितं सुधी: । उर्ध्वां द्रुष्टिं क्षणं कृत्वा तज्जलं वमयेत् पुनः ।। 39 ।।

मूल श्लोक · 1.40

नित्यामभ्यासयोगेन कफपित्तं निवारयेत् ।। 40 ।।

भावार्थ

बुद्धिमान साधक द्वारा भोजन करने के बाद ( भोजन करने के लगभग

चार घण्टे बाद ) पानी को इतनी मात्रा में पीना चाहिए कि पानी गले तक भर जाए । इसके बाद कुछ पल तक साधक द्वारा ऊपर की ओर देखते हुए पुनः उस सारे पानी को बाहर निकाल देना चाहिए । यह वमन धौति कहलाती है । इस प्रकार वमन धौति का नियमित रूप से अभ्यास करने से साधक के कफ व पित्त से सम्बंधित सभी विकार ( रोग ) समाप्त हो जाते हैं ।

विशेष

इस श्लोक में वमन धौति की विधि में लिखा है कि साधक को भोजन के बाद पानी पीकर उसे निकाल देना चाहिए । इसके विषय में सभी योग आचार्यों के अलग- अलग मत हैं । एक मत के अनुसार तो साधक को भोजन करने के तुरन्त बाद पानी पीकर इस क्रिया को करना चाहिए । यह क्रिया इसलिए न्यायसंगत नहीं लगती है क्योंकि ऐसा करने से तो सारा भोजन बाहर निकल जाएगा । साथ ही इस विधि का अभ्यास नियमित रूप से करने की बात कही गई है । जिससे इस विधि पर घोर शंका होती है । प्रतिदिन यदि ऐसा किया जाएगा तो शरीर अत्यंय कमजोर पड़ जाएगा । जब तक शरीर को पोषण के रूप में आहार प्राप्त नहीं होगा तो निश्चित रूप से उसका ( शरीर )  नाश हो जाएगा । इसलिए यहाँ पर ऋषि घेरण्ड इस प्रकार का कथन नहीं कह रहे हैं । इससे सम्बंधित एक अन्य क्रिया भी की जाती है जिसे आधुनिक योग आचार्यों ने व्याघ्र क्रिया का नाम दिया है । व्याघ्र क्रिया के प्रयोग के पीछे एक विशेष प्रयोजन होता है । कई बार हम गलती से गरिष्ठ, दूषित या ज्यादा मात्रा में भोजन ग्रहण कर लेते हैं । जिससे शरीर में नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है । उस खतरे से बचने के लिए व्याघ्र क्रिया का अभ्यास किया जाता है । इसे व्याघ्र क्रिया का नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि शेर भी इसी प्रकार करता है । जब कई बार शेर अत्यधिक मात्रा में किसी प्राणी के मांस का सेवन कर लेता है तो वह उसको उल्टी करके बाहर निकाल देता है । ठीक उसी तर्ज पर इसे व्याघ्र क्रिया का नाम दिया गया है ।

अब इसके बाद कुछ योग आचार्यों का मानना है कि भोजन के बाद का अर्थ है भोजन करने के कम से कम चार घण्टे बाद इस क्रिया को करना चाहिए । ऐसा इसलिए कहा गया है कि भोजन को पचने में कम से कम तीन से चार घण्टे का समय लगता है । इसके बाद ( 3- 4 घण्टे ) बाद भी भोजन का जो अंश ( भाग ) नहीं पचा है । वह शरीर के अन्दर अपच को बढ़ाकर शरीर में अनेक प्रकार के विष उत्पन्न करता है । इसलिए उस बिना पचे हुए भोजन के अंश को वमन धौति के द्वारा बाहर निकाला जाता है । यह विधि पूरी तरह से तर्कपूर्ण व न्यायसंगत लगती है । इसलिए सभी साधक अपने विवेक से भी इसका विश्लेषण करें ।

वासधौति / वस्त्र धौति विधि

मूल श्लोक · 1.41

चतुरङ्गुलविस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्ग्रसेत् । पुनः प्रत्याहरेदेतत्प्रोच्यते धौतिकर्मकम् ।। 41 ।।

भावार्थ

चार अँगुल चौड़ा बारीक कपड़ा लेकर उसे धीरे- धीरे गले से नीचे निगलते हुए अन्दर ले जाएं । उसके बाद पुनः उस कपड़े को धीरे- धीरे ही बाहर निकालें । इस क्रिया को वस्त्र धौति कहते हैं ।

विशेष

इसके लिए एक हल्के बारीक सूती वस्त्र का प्रयोग किया जाता है । जिसकी चौड़ाई चार अँगुलियों के बराबर ( लगभग तीन इंच ) होती है और लम्बाई लगभग बाईस फीट होती है ( हठ प्रदीपिका के अनुसार ) । इसके लिए सर्वप्रथम साधक कागासन में बैठें और उसके बाद उस कपड़े की गोल पट्टी बनाकर उसे गुनगुने पानी में भिगो ले । फिर धीरे- धीरे उसे मुँह द्वारा अन्दर निगलना होता है । इसमें साधक को सावधानी रखनी चाहिए कि सूती वस्त्र को दाँतों से बचा कर रखे । वस्त्र धौति को ज्यादा समय तक पेट के अन्दर नहीं रखना चाहिए । पाँच मिनट के अन्दर ही उसे बाहर निकालना शुरू कर देना चाहिए अन्यथा शरीर के अन्दर धौति के पचने की क्रिया शुरू हो सकती है । जिससे बहुत हानि हो सकती है । अतः साधक इसका अभ्यास सदा योग्य गुरु की देखरेख में ही करे ।

वासधौति / वस्त्र धौति लाभ

मूल श्लोक · 1.42

गुल्मज्वरप्लीहकुष्ठं कफपित्तं विनश्यति । आरोग्यं बलपुष्टिश्च भवेत्तस्य दिने दिने ।। 42 ।।

भावार्थ

वस्त्र धौति के अभ्यास से शरीर के सभी वायु विकार ( गैस्टिक ), ज्वर ( बुखार ), प्लीहा ( स्प्लीन ), चर्म व कुष्ठ रोग ( त्वचा रोग ) व कफ और पित्त के असन्तुलन से होने वाले सभी रोगों का नाश हो जाता है । जिससे शरीर में आरोग्यता, मजबूती और शक्ति ( ताकत ) का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता रहता है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Rita

    Thanks sir

  2. Neelam

    Thank you sir

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपको हृदय से आभार।

  4. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  5. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! हृद्धौति का बहुत ही सही विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद? ??

  6. Anshu

    ????

  7. Jitender

    Thank you Dr. Somveer arya ji