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  • Gheranda Samhita Ch. 1 [46-50]

बस्ति क्रिया के प्रकार

 

बस्ति क्रिया को षट्कर्म का दूसरा अंग माना है । इस क्रिया में हम अपने गुदा प्रदेश द्वारा अपनी बड़ी आँत की शुद्धि करते हैं । बस्ति से ठीक पहले धौति क्रिया के अन्तिम अंग के रूप में मूलशोधन क्रिया के द्वारा भी हम अपनी गुदा की सफाई करते हैं । मूलशोधन से केवल गुदा प्रदेश की ही सफाई हो पाती है बड़ी आँत की नहीं । अत: इसी बात को ध्यान में रखते हुए महर्षि घेरन्ड अगले ही सूत्र में बस्ति क्रिया का उपदेश करते हैं । जिससे साधक गुदा प्रदेश के साथ- साथ अपनी बड़ी आँत की भी सफाई कर सकें ।

 

घेरन्ड संहिता में बस्ति क्रिया के दो प्रकार बताएं हैं । जो इस प्रकार हैं-

 

जलबस्ति: शुष्कबस्तिर्बस्ति: स्याद् द्विविधा स्मृता ।

जलबस्तिं जले कुर्याच्छुकबस्तिं सदा क्षितौ ।। 46 ।।

अर्थ :- यह बस्ति क्रिया दो प्रकार की होती है । एक जल बस्ति और दूसरी शुष्क बस्ति । जल बस्ति का अभ्यास जल में तथा शुष्क बस्ति का अभ्यास भूमि अर्थात् जमीन पर बैठकर किया जाता है ।

 

 

विशेष :- बस्ति के दो प्रकार माने गए हैं । एक जलबस्ति और दूसरा स्थलबस्ति ।

 

जलबस्ति विधि

 

नाभिमग्नजले पायुं न्यस्तवानुत्कटासनम् ।

आकुञ्चनं प्रसारञ्च जलंबस्तिं समाचरेत् ।। 47 ।।

 

भावार्थ :- उत्कटासन लगाकर जल में नाभि प्रदेश तक बैठ जाएं । उसके बाद गुदा द्वार का आकुञ्चन ( गुदा को अन्दर की ओर खीचना ) व प्रसारण ( गुदा को बाहर की तरफ फैलाना ) करते हुए जलबस्ति क्रिया का अभ्यास करना चाहिए ।

 

विशेष :- जलबस्ति क्रिया में साधक को अश्वनी मुद्रा ( गुदा का आकुञ्चन व प्रसारण ) का अभ्यास करना चाहिए । परीक्षा की दृष्टि से इसमें मुख्य रूप से पूछा जा सकता है कि जलबस्ति क्रिया को करते हुए किस आसन का प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है उत्कटासन । साथ ही यह भी पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा का प्रयोग करने से जलबस्ति करने में शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती है ? जिसका उत्तर है अश्वनी मुद्रा । इसके लिए साधक को पानी के ऐसे टब में बैठना चाहिए जिसमें पानी उसकी नाभि तक आसानी से पहुँच सके । इससे कम या ज्यादा पानी नहीं होना चाहिए । साथ ही पानी स्वच्छ व अनुकूल तापमान वाला होना चाहिए । न अधिक ठण्डा और न अधिक गर्म ।

 

जलबस्ति के लाभ

 

प्रमेहञ्च उदावर्तं क्रूरवायुं निवारयेत् ।

भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कामदेवसमो भवेत् ।। 48 ।।

 

भावार्थ :- जल बस्ति क्रिया से प्रमेह ( शरीर से आवश्यक धातुओं का मूत्र मार्ग से निकलना ) उदावर्त अर्थात् वायु की अधिकता से शरीर में होने वाला भारीपन , वायु की क्रूरता अर्थात् तीव्रता से होने वाले रोग ( सर दर्द, गैस, डकार व शरीर में भारीपन आदि ) समाप्त होते हैं । इसके साथ ही साधक का शरीर स्वच्छ ( रोग रहित ) व कामदेव के समान सुन्दर व आकर्षित हो जाता है ।

 

स्थलबस्ति विधि

बस्ति: पश्चिमोत्तानेन चालयित्वा शनैरध: ।

अश्विनीमुद्रया पायुमाकुञ्चयेत् प्रसारयेत् ।। 49 ।।

 

भावार्थ :- भूमि पर पश्चिमोत्तानासन में बैठकर अश्वनी मुद्रा द्वारा गुदा प्रदेश को धीरे- धीरे चलाते हुए उसका आकुञ्चन ( गुदा को सिकोड़ना ) व प्रसारण ( गुदा प्रदेश को बाहर की ओर फैलाना ) करने की क्रिया को स्थलबस्ति कहते हैं ।

 

 

विशेष :- स्थलबस्ति का अभ्यास पश्चिमोत्तान आसन में बैठकर किया जाता है । इसके साथ ही इसमें अश्वनी मुद्रा का अभ्यास भी किया जाता है ।

 

 स्थलबस्ति के लाभ

 

एवमभ्यासयोगेन कोष्ठदोषो न विद्यते ।

विवर्द्धयेज्जठराग्निमामवातं विनाशयेत् ।। 50 ।।

 

भावार्थ :- इस प्रकार स्थल बस्ति का अभ्यास करने से साधक के कोष्ठबद्धता ( कब्ज ) आदि पेट सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं । इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है । जिसके कारण शरीर में आमवात ( खाना खाने के बाद शौच का दबाव बनना ) रोग भी नष्ट हो जाते हैं ।

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