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  • Gheranda Samhita Ch. 1 [19-22]

वह्निसार / अग्निसार धौति विधि

 

नाभिग्रन्थिं मेरुपृष्ठे शतवारञ्च कारयेत् ।

अग्निसार इयं धौतिर्योगिनां योगसिद्धिदा ।। 19 ।।

 

भावार्थ :- वह्निसार अपनी नाभि ( पेट के बीच में स्थित खड्डानुमा स्थान ) को मेरुदण्ड ( कमर ) के साथ सौ बार लगाने ( पेट को सौ बार आगे- पीछे करना ) को अग्निसार ( वह्निसार ) धौति क्रिया कहते हैं । यह क्रिया योगियों को साधना में सिद्धि प्रदान करवाती है ।

 

 

 

विशेष :- इस धौति क्रिया में दो नामों का प्रयोग किया गया है । एक वह्निसार और दूसरा अग्निसार । इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही होता है । वह्नि और अग्नि दोनों शब्दों का प्रयोग जठराग्नि के लिए किया जाता है । इस क्रिया का प्रचलित नाम अग्निसार है । जिसका प्रयोग ज्यादा किया जाता है । वह्नि शब्द का अर्थ भी अग्नि ही होता है । अतः वह्निसार और अग्निसार एक ही क्रिया है । इसकी विधि को हम थोड़ा सा प्रयोगात्मक स्तर पर समझने का प्रयास करते हैं । जिससे इससे सम्बंधित भ्रान्ति का निवारण किया जा सके । अपनी नाभि को कम से कम सौ बार अपनी कमर के साथ लगाना अग्निसार होती है । इसके लिए जो पूरी विधि है उसके लिए साधक पहले अपने श्वास को बाहर छोड़कर बाहर ही रोक दे । इसके बाद अपने पेट को आगे व पीछे की ओर चलाना ( धकेलना ) चाहिए । प्रारम्भ में कोई भी साधक सौ बार इसका अभ्यास एक ही श्वास में करने में समर्थ नहीं होता । इसलिए जब तक सौ बार यह क्रिया नहीं हो जाती तब तक इसका अभ्यास करते रहना चाहिए । ऐसा कुछ समय करने के बाद अर्थात् अभ्यास मजबूत होने पर साधक एक श्वास में ही इसे सौ बार आगे- पीछे करने में समर्थ हो जाता है ।

 

 

वह्निसार / अग्निसार धौति लाभ

 

 उदरामयजं त्यक्तवा जठराग्निं विवर्द्धयेत् ।

एषा धौति परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा ।

केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ।। 20 ।।

 

भावार्थ :- अग्निसार धौति का अभ्यास करने से साधक के उदर ( पेट ) से सम्बंधित सभी रोग दूर हो जाते हैं और जठराग्नि तीव्र हो जाती है । यह क्रिया देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( कठिनता से प्राप्त होने वाली ) है साथ ही यह क्रिया अत्यन्त गुप्त रखने योग्य है । केवल इसी क्रिया का अभ्यास करने से साधक का शरीर निश्चित रूप से देवताओं के समान दिव्य तेज रूप वाला हो जाता है ।

 

 

बहिष्कृत धौति विधि

 

काकीमुद्रां शोधयित्वा पूरये दुदरम्महत् ।। 21 ।।

धारयेदर्धयामन्तु चालये द धोवर्त्मना ।

एषा धौति: परागोप्या न प्रकाश्या कदाचन ।। 22 ।।

 

भावार्थ :- काकीमुद्रा ( कौवे के समान मुख करके ) को साधकर ( उसमें पारंगत होकर ) अपने उदर ( पेट ) में वायु को मुख के द्वारा अन्दर भरना चाहिए । अब उस वायु को आधे प्रहर अर्थात् डेढ़ घण्टे तक पेट के अन्दर ही रोककर रखे और इसके बाद उस रोकी हुई वायु को गुदा मार्ग से बाहर निकाल देना चाहिए । इस धौति क्रिया के भी अति गोपनीय होने के कारण इसको कभी भी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए ।

 

 

विशेष :- इस बहिष्कृत धौति क्रिया की विधि भी बिलकुल वातसार धौति क्रिया की तरह ही होती है । इसमें व वातसार की विधि में केवल कुम्भक ( वायु को रोकने ) का ही अन्तर है । इसके अलावा यह दोनों ही विधियाँ समान है । इसको याद रखने के लिए विद्यार्थी को बहिष्कृत शब्द के अर्थ को समझना आवश्यक है । बहिष्कृत का अर्थ होता है बाहर निकाल देना अथवा बाहर फेंक देना । जब हम किसी वस्तु का प्रयोग कर लेते हैं तो उसके बचे हुए अवशेष या अवशिष्ट को बाहर कूड़े में फेंक देते हैं । ठीक उसी प्रकार जब हम वायु को पीकर उसको शरीर में रोककर उसका उपयोग कर लेते हैं तो उसके बाद वह अवशिष्ट रूप में ही बचता है और पेट में बचे हुए अवशिष्ट को हम गुदा मार्ग से ही बाहर निकालते हैं । इसलिए विद्यार्थी इस प्रकार इसे आसानी से याद रख सकते हैं ।

 

इस क्रिया में वायु को डेढ़ घंटे तक शरीर के अन्दर रोकने की जो बात कही गई है उसका अर्थ यह नहीं है कि हम वायु को पेट के अन्दर डेढ़ घण्टे तक रोकने के बाद अपनी श्वास- प्रश्वास की क्रिया को रोक देते हैं । ऐसा करना सम्भव हो सकता है लेकिन उसके लिए साधक को बहुत वर्षों की साधना द्वारा अपने प्राण को साधना पड़ेगा । जो कि यहाँ षट्कर्म के उपदेश में न्याय संगत नहीं लगता । अगर ऐसा होता तो इस धौति का अभ्यास घेरण्ड ऋषि प्राणायाम के बाद में करने का उपदेश करते । जबकि उन्होंने इसे साधना के प्रारम्भ में ही करने की बात कही है । मेरा ऐसा मानना है कि यहाँ पर वायु को डेढ़ घंटे तक शरीर के अन्दर ही धारण करने की बात से अभिप्राय यह है कि जिस वायु को साधक काकीमुद्रा द्वारा ग्रहण करता है उस वायु को वह अपने पेट में ही स्थिर करके उसकी धीरे- धीरे चलाता रहता है और इस दौरान अपनी श्वास- प्रश्वास की प्रक्रिया को भी जारी रखता है । वह केवल उसी वायु को अन्दर रोककर रखता है जिसे काकीमुद्रा द्वारा अन्दर भरा गया था । इसके अलावा जो श्वसन क्रिया नासिका द्वारा होती है वह निर्बाध गति से चलती रहती है । उसका इस वायु ( काकीमुद्रा वाली ) से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।

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