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Gheranda Samhita

Gheranada Samhita Ch. 1 [12-18]

अध्याय 1: षट्कर्म

षट्कर्म वर्णन

मूल श्लोक · 1.12

धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिर्लौलिकी त्राटकं तथा । कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ।। 12 ।।

भावार्थ

योग साधक को धौति, बस्ति, नेति, लौलिकी ( नौलि ), त्राटक व कपालभाति नामक इन छ: प्रकार की शुद्धि क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिए ।

विशेष

महर्षि घेरण्ड ने षट्कर्मों को योग के पहले अंग के रूप में मान्यता दी है । उनका कहना है कि योग साधक को सबसे पहले षट्कर्मों द्वारा अपने शरीर का शुद्धिकरण करना चाहिए । इसके बाद ही साधक अन्य प्रकार की योग साधना करने के योग्य होता है । षट्कर्मों को मुख्य रूप से प्रचारित करने का श्रेय भी घेरण्ड ऋषि को ही जाता है । इन्होंने छ: षट्कर्मों के भी अलग- अलग प्रकारों का वर्णन करके इसको घेरण्ड संहिता के एक पूरे अध्याय का रूप देकर इनकी उपयोगिता को दर्शाया है ।

धौति के प्रकार

मूल श्लोक · 1.13

अन्तर्धौतिर्दन्तधौतिर्हृद्धौतिर्मूलशोधनम् । धौतिं चतुर्विधां कृत्वा घटं कुर्वन्ति निर्मलम् ।। 13 ।।

भावार्थ

इस श्लोक में धौति के चार प्रकार बताते हुए कहा है कि अन्तर्धौति, दन्तधौति, हृदयधौति व मूलशोधन यह धौति के चार प्रकार हैं । साधक को इनका अभ्यास करके अपने शरीर की शुद्धि करनी चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में षट्कर्म के पहले अंग अर्थात् धौति के चार प्रकारों का वर्णन किया गया है । धौति मुख्य रूप से चार प्रकार की होती है और यदि धौति के इन चार प्रकारों के भी अलग- अलग प्रकारों या भेदों की बात करें तो इनकी कुल संख्या तेरह ( 13 ) हो जाती है । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जानकारी है । जिसे ऊपर दिये गए डायग्राम द्वारा आसानी से समझा जा सकता है ।

अन्तर्धौति के प्रकार

मूल श्लोक · 1.14

वातसारं वारिसारं वह्निसारं बहिष्कृतम् । घटस्य निर्मलार्थाय अन्तधौतिश्चतुर्विधा ।। 14 ।।

भावार्थ

शरीर को शुद्ध करने के लिए साधक को अन्तर्धौति की निम्न चार प्रकार अथवा विधियों ( वातसार, वारिसार, वह्निसार ( अग्निसार ) और बहिष्कृत ) का अभ्यास करना चाहिए ।

विशेष

धौति के चार प्रकारों में सबसे पहले प्रकार अर्थात् अन्तर्धौति के भी चार भेद बताये गये हैं । इनके क्रम व संख्या को परीक्षा की दृष्टि से बहुत उपयोगी माना जाता है । अतः विद्यार्थी इनको अच्छी प्रकार से याद करें । आगे के श्लोकों में इन सभी की विधि व इनसे मिलने वाले लाभ बताये जायेंगे ।

वातसार धौति विधि

मूल श्लोक · 1.15

काकचञ्चुवदास्येन पिबेद् वायुं शनै:शनै: । चालयेदुदरं पश्चाद्वर्त्मना रेचयेच्छनै: ।। 15 ।।

भावार्थ

साधक को अपने मुहँ को कौवे की चोंच की तरह बनाकर उससे धीरे- धीरे से प्राणवायु को पीना चाहिए अर्थात् प्राणवायु को शरीर के अन्दर ग्रहण करना चाहिए । फिर अपने पेट को चलाते हुए ( आगे- पीछे या दायें से बायीं ओर घुमाते हुए ) उस वायु को पीछे अर्थात् गुदा मार्ग से धीरे- धीरे बाहर निकालना चाहिए ।

विशेष

वातसार को याद रखने के लिए विद्यार्थी वातसार शब्द को पहले दो अलग- अलग भागों वात और सार में बाट ले । वात का अर्थ है वायु और सार का अर्थ है उसका निचोड़ । अब इसे आसानी से याद किया जा सकता है कि वायु को पीकर उसको निचोड़ देना चाहिए । निचोड़ने का अर्थ होता है उसके उपयोगी तत्त्व को निकाल लेना । जब हम किसी पदार्थ के आवश्यक तत्त्व को निकाल लेते हैं तो उसके बाद उस पदार्थ का क्या करते हैं ? निश्चित रूप से हम उसे अवशिष्ट पदार्थ की तरह फेंक देते हैं । इसे एक उदाहरण से समझते हैं । जैसे एक नींबू के रस को निचोड़ने के बाद जिस प्रकार उसके छिलके को हम फेंक देते हैं । ठीक उसी प्रकार जब हमने वायु को पेट में चलाकर उसके सार को ग्रहण कर लेते हैं तो उसे भी हम निश्चित रूप से बाहर ही फेंकेते हैं । और जिस वायु का शरीर के भीतर प्रयोग कर लिया गया हो तो उसका निष्कासन तो नीचे अर्थात् गुदा मार्ग से ही किया जाएगा । ऐसे ही हम भोजन को ग्रहण करके उसके रस को पचाकर बाकी बचे हुए अवशिष्ट को गुदा मार्ग द्वारा ही बाहर निकाल देते हैं । इस उदाहरण द्वारा आप इसकी विधि को आसानी से याद रख सकते हैं ।

वातसार धौति लाभ

मूल श्लोक · 1.16

वातसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारणम् । नाशयेत्सकलान् रोगान् वह्निमुद्दीपयेतथा ।। 16 ।।

भावार्थ

वातसार अत्यन्त गुप्त रखने वाली यौगिक क्रिया है । इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर स्वच्छ ( मल रहित ) हो जाता है । यह शरीर के सभी रोगों को नष्ट करती है और जठराग्नि ( पाचन क्रिया ) को तीव्र अर्थात् मजबूत करती है ।

वारिसार धौति विधि

मूल श्लोक · 1.17

आकण्ठं पूरयेद्वारि वक्त्रेण च पिबेच्छनै: । चालयेदुदरेणैव चोदराद्रेचयेदध: ।। 17 ।।

भावार्थ

जल ( पानी ) को मुहँ द्वारा धीरे- धीरे इतनी मात्रा में पीना चाहिए जिससे कि वह गले तक आ जाये अर्थात् इतना पानी पीना चाहिए कि वह गले तक आ जाये । इसके बाद अपने पेट को चलाते हुए ( आगे-पीछे अथवा दायें से बायें ) उस पानी को अधोमार्ग ( गुदा द्वार ) से बाहर निकाल दें ।

विशेष

वारिसार की विधि और वातसार की विधि दोनों ही पूरी तरह से मिलती जुलती ही है । इसको याद रखने के लिए विद्यार्थी को केवल इसके पहले शब्द को समझने की आवश्यकता है । वातसार और वारिसार शब्दों में पीछे के दोनों शब्द ( सार ) समान हैं । वातसार में वात का अर्थ होता है वायु और वारिसार में वारि शब्द का अर्थ जल अथवा पानी होता है । बाकी की विधि बिलकुल समान है । वातसार में यह क्रिया वायु के द्वारा पूरी होती है और वारिसार में यह क्रिया पानी के द्वारा पूरी की जाती है । बाकी सब समान विधि समान होती है । अतः सभी छात्रों को केवल वात ( वायु ) और वारि ( जल ) शब्दों को ही याद रखना है ।

वारिसार धौति लाभ

मूल श्लोक · 1.18

वारिसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारणम् । साधयेत्तं प्रयत्नेन देवदेहं प्रपद्यते ।। 18 ।।

भावार्थ

वारिसार क्रिया भी वातसार की तरह ही अत्यन्य गोपनीय यौगिक क्रियाओं में से एक है । इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर पूरी तरह से स्वच्छ ( विजातीय द्रव्यों से रहित ) हो जाता है । पूरे मनोभाव से इसका अभ्यास करने से साधक का शरीर देवताओं के समान दिव्य रूप ( अत्यन्य मनमोहक ) वाला हो जाता है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. पूष्पा तोंडारे

    सर आपने जो किताबों कि लिस्ट दि है ,क्या वें किताबे कहा उपलब्ध होगी ,कृपया मार्गदर्शन किजियें. धन्यवाद.

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    अति सुन्दर व्याख्या।

  3. Anita

    Regular kuch n kuch naya, ye hamare liye acha hota h

  4. Sonika

    Thanks sir ki

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Anshu

    Om

  7. Ram Das Verma

    Please tell about a centre which provides such type of yoga education as Shatkarma yoga.