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Shrimad Bhagwad Geeta

Geeta Introduction - श्रीमद्श्रीमद्भगवद्गीता परिचय

अध्याय परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला आध्यात्मिक ग्रन्थ है । विश्व की लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है । गीता में ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग व राजयोग के अतिरिक्त समत्वं योग, सन्यास योग, सांख्य योग, श्रद्धात्रय योग व मोक्ष का अद्भुत संगम है । गीता में कुल अठारह ( 18 ) अध्याय हैं जिनमें कुल सात सौ ( 700 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । गीता के इन सात सौ श्लोकों को चार व्यक्तियों द्वारा बोला और सुना गया है । जिनमें से राजा धृतराष्ट्र ने केवल एक ही श्लोक बोला है । इसके बाद संजय ने कुल बयालीस ( 42 ) श्लोक बोले हैं । अर्जुन ने कुल चौरासी ( 84 ) श्लोक बोले हैं और शेष पाँच सौ तिहत्तर ( 573 ) श्लोकों के वक्ता स्वयं योगी श्रीकृष्ण हैं । गीता में सबसे ज्यादा श्लोक योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा ही बोले गए हैं ।

गीता का ज्ञान हमें जीवन को सही तरीके से जीने का ढंग बताता है । आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस प्रकार से हम अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी भावनाओं को सन्तुलित रखते हुए व्यवहार करें ? अनुकूलता आने पर व्यक्ति में अहम का भाव व प्रतिकूलता होने पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । यह दोनों ही परिस्थितियाँ हमारे लिए घातक अथवा हानिकारक होती हैं । अब प्रश्न उठता है कि अनुकूल व प्रतिकूल अवस्थाओं में हमारा व्यवहार किस प्रकार का होना चाहिए ? ताकि अहम व तनाव दोनों से ही बचा जा सके । गीता के अनुपम ज्ञान से हमें इस प्रश्न का अत्यंत सटीक उत्तर प्राप्त होता है ।

गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने आज से लगभग पाँच हजार वर्ष ( 5000 ) पूर्व हरियाणा प्रदेश में स्थित कुरुक्षेत्र नामक स्थान पर अपने प्रिय मित्र अर्जुन को दिया था । गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंग है । गीता का वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व के पच्चीसवें ( 25 ) से आरम्भ होता है और अध्याय बयालीस ( 42 ) तक किया गया है । इसलिए इसे भीष्म पर्व का अंग कहा जाता है । गीता को प्रस्थानत्रयी का भी एक अंग माना जाता है । बहुत सारे विद्यार्थियों का यह प्रश्न होता है कि यह प्रस्थानत्रयी क्या होता है ? इसका उत्तर बहुत ही सरल है । प्रस्थान शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से हम कही पर भी जाने के लिए करते हैं । जैसे- कृपा आप भोजन के लिए प्रस्थान करें । प्रस्थान शब्द का अर्थ किसी उद्देश्य के लिए चलना अथवा किसी विशेष प्रयोजन के लिए किसी विशेष स्थान पर जाना होता है । यहाँ पर प्रस्थान शब्द का प्रयोग जीवन के परम लक्ष्य अथवा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक निश्चित मार्ग पर चलना है और त्रय शब्द का अर्थ तीन होता है । अतः हमारे वैदिक साहित्य के तीन प्रमुख शास्त्रों ( उपनिषद, गीता व वेदान्त दर्शन ) की शिक्षाओं पर चलकर मोक्ष मार्ग को प्राप्त करने को ही प्रस्थानत्रयी कहा जाता है । या यूँ कहें कि मुक्ति अथवा मोक्ष प्राप्त करने के लिए उपनिषद, गीता व वेदान्त दर्शन की शिक्षाओं पर चलना ही प्रस्थानत्रयी कहलाता है ।

प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है । किसी भी कार्य की उत्पत्ति बिना कारण के नहीं हो सकती । ठीक उसी प्रकार महाभारत के युद्ध के पीछे भी अनेक कारण थे । अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि महाभारत के युद्ध में गीता के उपदेश के पीछे ऐसा कौन सा कारण था कि जिससे युद्ध के माहौल में ही श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का उपदेश दिया गया ? अनेक विद्वानों व आचार्यों के अनुसार इसके भिन्न- भिन्न कारण हो सकते हैं । लेकिन चूंकि गीता मेरा शोध का विषय रही है । अपने शोध ( Ph.D. ) में मैंने गीता की योग साधनाओं का योगसूत्र की योग साधना पद्धतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया है । ऐसे में मैंने गीता के उपदेश के पीछे जो मुख्य कारण देखा वह ‘राग’ नामक क्लेश है । हो सकता है कि बहुत सारे विद्वान मेरी इस बात से सहमति न रखते हों । लेकिन गीता के उपदेश के पीछे छुपे हुए कारणों पर यदि गहनता से विचार किया जाए तो इसे आसानी से समझा जा सकता है । जिस अर्जुन का जन्म एक क्षत्रिय राज परिवार में हुआ, जिसका लालन- पालन भी क्षत्रिय माहौल में हुआ, जिसकी पूरी शिक्षा- दीक्षा क्षत्रिय वर्ण के अनुसार हुई हो और जिसने इससे पहले जितने भी युद्ध लड़े, उन सभी में विजय प्राप्त की हो । तब यह बात अत्यन्य विचारणीय हो जाती है कि आखिर महाभारत के युद्ध में ऐसा कौन सा भय था जिससे युद्ध के मैदान में उसके हाथ से उसका गाण्डीव ( धनुष ) छूटकर नीचे गिर जाता है ? इसका उत्तर है कि अर्जुन अवसादग्रस्त हो गया था जिसकी वजह से उसके हाथ से गाण्डीव छूट गया था और वह तनावपूर्ण स्थिति में रथ में बैठ जाता है । यह बिलकुल तर्कसंगत मत है । लेकिन इस अवसाद के पीछे ऐसा कौन सा कारण था जिसने इतने बड़े योद्धा के भीतर अवसाद को पैदा कर दिया ? इसका उत्तर है ‘राग’ नामक क्लेश जिसे गीता में मोह कहकर संबोधित किया गया है । जब अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि हे कृष्ण ! आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो । मैं देखना चाहता हूँ कि युद्ध की इच्छा से कौन- कौन से महारथी हैं जो हमसे युद्ध करने के लिए यहाँ पर आए हैं ? इसके बाद श्रीकृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर देते हैं । जैसे ही अर्जुन अपने सामने खड़े हुए योद्धाओं में अपने सभी परिचितों ( पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, मामा, भाई, व सगे संबंधियों ) को देखता है तो उसके भीतर उन सबके प्रति जो आसक्ति अथवा लगाव था । वह प्रबल हो उठता है और अर्जुन राग के वशीभूत होकर उन सभी पुरानी घटनाओं को याद करते हैं जिनमें उसने उन सभी के साथ सुख के पल बिताये थे । फिर चाहे वह भीष्म पितामह हों, गुरु द्रोणाचार्य हों या अन्य सगे सम्बन्धी । जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा समय मनुष्य को सुख अथवा आनन्द की अनुभूति करवाते हैं । उनको फिर से प्राप्त करने की प्रबल इच्छा राग कहलाती है । ऐसा ही यहाँ पर अर्जुन के साथ हुआ । उसे अपने दादा, गुरु, भाइयों व सगे संबंधियों के साथ बिताए गए सभी सुख अथवा आनन्द के पुराने पल याद हो उठते हैं और वह उनके युद्ध के मैदान में मारकर उन सभी पलों को खोना नहीं चाहता था । जिसके चलते वह मोहग्रस्त होकर युद्ध न करने की बात कहता है । लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण उसे आत्मा की अमरता व शरीर की नश्वरता के विषय में बताया और स्वभाव से उत्पन्न कर्म की अनिवार्यता को समझाते हैं । वैसे ही उसके भीतर अविद्या के कारण जो राग नामक क्लेश उत्पन्न हुआ था । वह पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और वह युद्ध के लिए तैयार हो जाता है । अतः इस निष्कर्ष के आधार पर ही मैंने गीता के उपदेश के पीछे ‘राग’ नामक क्लेश को उत्तरदायी माना है ।

श्रीमद्भगवद्गीता परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला आध्यात्मिक ग्रन्थ है । विश्व की लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है । गीता में ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग व राजयोग के अतिरिक्त समत्वं योग, सन्यास योग, सांख्य योग, श्रद्धात्रय योग व मोक्ष का अद्भुत संगम है । गीता में कुल अठारह ( 18 ) अध्याय हैं जिनमें कुल सात सौ ( 700 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । गीता के इन सात सौ श्लोकों को चार व्यक्तियों द्वारा बोला और सुना गया है । जिनमें से राजा धृतराष्ट्र ने केवल एक ही श्लोक बोला है । इसके बाद संजय ने कुल बयालीस ( 42 ) श्लोक बोले हैं । अर्जुन ने कुल चौरासी ( 84 ) श्लोक बोले हैं और शेष पाँच सौ तिहत्तर ( 573 ) श्लोकों के वक्ता स्वयं योगी श्रीकृष्ण हैं । गीता में सबसे ज्यादा श्लोक योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा ही बोले गए हैं ।

गीता का ज्ञान हमें जीवन को सही तरीके से जीने का ढंग बताता है । आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस प्रकार से हम अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी भावनाओं को सन्तुलित रखते हुए व्यवहार करें ? अनुकूलता आने पर व्यक्ति में अहम का भाव व प्रतिकूलता होने पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । यह दोनों ही परिस्थितियाँ हमारे लिए घातक अथवा हानिकारक होती हैं । अब प्रश्न उठता है कि अनुकूल व प्रतिकूल अवस्थाओं में हमारा व्यवहार किस प्रकार का होना चाहिए ? ताकि अहम व तनाव दोनों से ही बचा जा सके । गीता के अनुपम ज्ञान से हमें इस प्रश्न का अत्यंत सटीक उत्तर प्राप्त होता है ।

गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने आज से लगभग पाँच हजार वर्ष ( 5000 ) पूर्व हरियाणा प्रदेश में स्थित कुरुक्षेत्र नामक स्थान पर अपने प्रिय मित्र अर्जुन को दिया था । गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंग है । गीता का वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व के पच्चीसवें ( 25 ) से आरम्भ होता है और अध्याय बयालीस ( 42 ) तक किया गया है । इसलिए इसे भीष्म पर्व का अंग कहा जाता है । गीता को प्रस्थानत्रयी का भी एक अंग माना जाता है । बहुत सारे विद्यार्थियों का यह प्रश्न होता है कि यह प्रस्थानत्रयी क्या होता है ? इसका उत्तर बहुत ही सरल है । प्रस्थान शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से हम कही पर भी जाने के लिए करते हैं । जैसे- कृपा आप भोजन के लिए प्रस्थान करें । प्रस्थान शब्द का अर्थ किसी उद्देश्य के लिए चलना अथवा किसी विशेष प्रयोजन के लिए किसी विशेष स्थान पर जाना होता है । यहाँ पर प्रस्थान शब्द का प्रयोग जीवन के परम लक्ष्य अथवा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक निश्चित मार्ग पर चलना है और त्रय शब्द का अर्थ तीन होता है । अतः हमारे वैदिक साहित्य के तीन प्रमुख शास्त्रों ( उपनिषद, गीता व वेदान्त दर्शन ) की शिक्षाओं पर चलकर मोक्ष मार्ग को प्राप्त करने को ही प्रस्थानत्रयी कहा जाता है । या यूँ कहें कि मुक्ति अथवा मोक्ष प्राप्त करने के लिए उपनिषद, गीता व वेदान्त दर्शन की शिक्षाओं पर चलना ही प्रस्थानत्रयी कहलाता है ।

प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है । किसी भी कार्य की उत्पत्ति बिना कारण के नहीं हो सकती । ठीक उसी प्रकार महाभारत के युद्ध के पीछे भी अनेक कारण थे । अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि महाभारत के युद्ध में गीता के उपदेश के पीछे ऐसा कौन सा कारण था कि जिससे युद्ध के माहौल में ही श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का उपदेश दिया गया ? अनेक विद्वानों व आचार्यों के अनुसार इसके भिन्न- भिन्न कारण हो सकते हैं । लेकिन चूंकि गीता मेरा शोध का विषय रही है । अपने शोध ( Ph.D. ) में मैंने गीता की योग साधनाओं का योगसूत्र की योग साधना पद्धतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया है । ऐसे में मैंने गीता के उपदेश के पीछे जो मुख्य कारण देखा वह ‘राग’ नामक क्लेश है । हो सकता है कि बहुत सारे विद्वान मेरी इस बात से सहमति न रखते हों । लेकिन गीता के उपदेश के पीछे छुपे हुए कारणों पर यदि गहनता से विचार किया जाए तो इसे आसानी से समझा जा सकता है । जिस अर्जुन का जन्म एक क्षत्रिय राज परिवार में हुआ, जिसका लालन- पालन भी क्षत्रिय माहौल में हुआ, जिसकी पूरी शिक्षा- दीक्षा क्षत्रिय वर्ण के अनुसार हुई हो और जिसने इससे पहले जितने भी युद्ध लड़े, उन सभी में विजय प्राप्त की हो । तब यह बात अत्यन्य विचारणीय हो जाती है कि आखिर महाभारत के युद्ध में ऐसा कौन सा भय था जिससे युद्ध के मैदान में उसके हाथ से उसका गाण्डीव ( धनुष ) छूटकर नीचे गिर जाता है ? इसका उत्तर है कि अर्जुन अवसादग्रस्त हो गया था जिसकी वजह से उसके हाथ से गाण्डीव छूट गया था और वह तनावपूर्ण स्थिति में रथ में बैठ जाता है । यह बिलकुल तर्कसंगत मत है । लेकिन इस अवसाद के पीछे ऐसा कौन सा कारण था जिसने इतने बड़े योद्धा के भीतर अवसाद को पैदा कर दिया ? इसका उत्तर है ‘राग’ नामक क्लेश जिसे गीता में मोह कहकर संबोधित किया गया है । जब अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि हे कृष्ण ! आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो । मैं देखना चाहता हूँ कि युद्ध की इच्छा से कौन- कौन से महारथी हैं जो हमसे युद्ध करने के लिए यहाँ पर आए हैं ? इसके बाद श्रीकृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर देते हैं । जैसे ही अर्जुन अपने सामने खड़े हुए योद्धाओं में अपने सभी परिचितों ( पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, मामा, भाई, व सगे संबंधियों ) को देखता है तो उसके भीतर उन सबके प्रति जो आसक्ति अथवा लगाव था । वह प्रबल हो उठता है और अर्जुन राग के वशीभूत होकर उन सभी पुरानी घटनाओं को याद करते हैं जिनमें उसने उन सभी के साथ सुख के पल बिताये थे । फिर चाहे वह भीष्म पितामह हों, गुरु द्रोणाचार्य हों या अन्य सगे सम्बन्धी । जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा समय मनुष्य को सुख अथवा आनन्द की अनुभूति करवाते हैं । उनको फिर से प्राप्त करने की प्रबल इच्छा राग कहलाती है । ऐसा ही यहाँ पर अर्जुन के साथ हुआ । उसे अपने दादा, गुरु, भाइयों व सगे संबंधियों के साथ बिताए गए सभी सुख अथवा आनन्द के पुराने पल याद हो उठते हैं और वह उनके युद्ध के मैदान में मारकर उन सभी पलों को खोना नहीं चाहता था । जिसके चलते वह मोहग्रस्त होकर युद्ध न करने की बात कहता है । लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण उसे आत्मा की अमरता व शरीर की नश्वरता के विषय में बताया और स्वभाव से उत्पन्न कर्म की अनिवार्यता को समझाते हैं । वैसे ही उसके भीतर अविद्या के कारण जो राग नामक क्लेश उत्पन्न हुआ था । वह पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और वह युद्ध के लिए तैयार हो जाता है । अतः इस निष्कर्ष के आधार पर ही मैंने गीता के उपदेश के पीछे ‘राग’ नामक क्लेश को उत्तरदायी माना है ।

Reader discussion

Comments (18)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Shankar prajapati

    अति उत्तम ज्ञान…सर??

  2. praveen choudhary

    Thankyou sir ji itni saral bhasha me Gita ka prichy diya bhut bhut dhanyvad..

  3. Anshu

    . Prnam Aacharya ji ! Gita pr adbhut bhasha prastut krne ke liye hriday se bhut bhut dhanyvad… Yh lekh bhut hi gyanvrdhaka hai…. Jai Sri Krishna…. ,Om

  4. Nisha Dahiya

    Thank you sir

  5. MANOJ THAKUR

    जी सहमत ।

  6. ashi gusain

    sunder ?

  7. Pritam Halder

    Please sir explain in english. I don’t understand hindi word. ???? I am an B. Sc. Yoga student in VISVA-BBHARATI UNIVERSITY.

  8. Shankar prajapati

    Ati uttam sir…??

  9. Aashish malhan

    Dr sahab nice starting of geeta.

  10. Kaushal bhatia

    Namaskar Sir ji

    Kya raag namak klesh qci k ya byn k ans. mein likhna sahi rahega?

  11. ashi gusain

    bahut sunder

  12. Laxmi

    Thank u sir ?

  13. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    आज से गीता का उपदेश प्रस्तुत करने हेतु

    आपको हृदय से परम आभार प्रेषित करता हूं।

  14. jyoti sharma

    very nice sir

  15. pratap deepak

    धन्यवाद सर

  16. praveen kumar paliwal

    aapke dwara bahut hi shaandaar jaankari di gayi sirji . thank you very much.

  17. PARVEEN

    बहुत ही सरल और सहज भाषा में गीता का व्याख्यान करने लिए दिल की गहराइयों से धन्यवाद गुरु जी।

  18. Bhanu Shrivastava

    Kai jagah geeta ko bheesma parv ke 13 adhyay se shuru kyun mana jata hai? Or upnishad or vedant me kya difference hai? Kyunki mujhe to gyat hai ki upnishad ko hi vedant kaha jata hai. Aapne phd ki hai, kewal sahi gyan bataiye