एकसमये चोभयानवधारणम् ।। 20 ।। शब्दार्थ :- च ( और ) एकसमये ( एक ही काल अर्थात समय में ) उभय ( दोनों अर्थात चित्त और विषय के स्वरूप को ) अनवधारणम् ( धारण नहीं किया जा सकता या उनका ज्ञान नहीं हो सकता ) सूत्रार्थ :- एक ही समय में एक …
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ।। 19 ।। शब्दार्थ :- तत् ( वह चित्त ) दृश्यत्वात् ( स्वयं दृश्य अर्थात प्रकृति से निर्मित होने से ) स्वाभासम् ( स्वयं प्रकाश स्वरूप अर्थात खुद में ज्ञानवान ) न ( नहीं है ) सूत्रार्थ :- वह चित्त दृश्य होने के कारण ( प्रकृति से निर्मित ) …
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभो: पुरुषस्यापरिणामित्वात् ।। 18 ।। शब्दार्थ :- तत् ( उस अर्थात उस चित्त के ) प्रभो: ( स्वामी ) पुरुषस्य ( पुरुष अर्थात आत्मा के ) अपरिणामित्वात् ( अपरिणामी अर्थात अपरिवर्तनशील होने से उसे ) चित्तवृत्तय: ( चित्त की सभी वृत्तियाँ ) सदा ( हमेशा ) ज्ञाता ( ज्ञात रहती है अर्थात उनके …
तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ।। 17 ।। शब्दार्थ :- तद् ( उस अर्थात उस दिखाई देने वाली वस्तु के साथ ) उपराग ( सम्बन्ध या लीन होने की ) अपेक्षित्वात् ( अपेक्षा अर्थात कामना करने वाला होने से ) चित्तस्य ( चित्त के ) वस्तु ( दिखाई देने वाली वस्तु या पदार्थ ) ज्ञात ( …
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ।। 16 ।। शब्दार्थ :- च ( और ) वस्तु ( दिखाई देने वाला पदार्थ ) एकचित्त ( एक ही चित्त के ) तन्त्रम् ( अधीन या नियंत्रण में ) न ( नहीं है ) तद् ( जब वह पदार्थ ) अप्रमाणकम् ( बिना किसी प्रमाण अर्थात …
