प्रमुख चार आसन  चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि वै । तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम् ।। 35 ।।   भावार्थ :- भगवान शिव ने कुल चौरासी ( 84 ) आसनों का वर्णन किया है । यहाँ पर मैं उन सभी आसनों के सार कहे जाने वाले मुख्य चार आसनों का वर्णन कर रहा हूँ ।   विशेष :- यहाँ

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Hatha Pradipika Ch. 1 [35-36]

पश्चिमतान आसन का लाभ  इति पश्चिमतान मासनाग्र्यं पवनं पश्चिमवाहिनं करोति । उदरं जठरानलस्य कुर्यादुदरे काश्यमरोगतां च पुंसाम् ।। 31 ।।   भावार्थ :- इन सभी आसनों ( इससे पूर्व में जिन आसनों का वर्णन किया गया है ) में पश्चिमत्तान आसन सबसे अग्रणीय या मुख्य आसन है । इसके अभ्यास से साधक का प्राण मेरुदण्ड

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Hatha Pradipika Ch. 1 [31-34]

मत्स्येंद्र आसन    वामोरुमूलार्पित दक्षपादं जानोर्बहिर्वेष्टितवामपादम् । प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्तिताङ्ग: श्री मत्स्यनाथोदितमासनं स्यात् ।। 28 ।।   भावार्थ :- बायीं जंघा के मूल भाग ( बीच में ) पर दायें पैर को रखें । अब अपने बायें पैर को अपने दाहिने पैर के घुटने के पास रखते हुए घुटने ( बायें ) को सीधा रखें ।

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Hatha Pradipika Ch. 1 [28-30]

आसन प्रारम्भ   स्वस्तिकासन  जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकाय: समासीन: स्वस्तिकं तत् प्रचक्षते ।। 21 ।।   भावार्थ :- दोनों पैरों के तलवों ( पैर के सबसे नीचे का भाग ) को एक दूसरे पैर अर्थात बायें पैर के तलवे को दायीं पिण्डली व जांघ के बीच में और दायें पैर के तलवे को बायें

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Hatha Pradipika Ch. 1 [21-27]

आसन वर्णन  हठस्य प्रथमाङ्गत्वादासनं पूर्वमुच्यते । कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चाङ्गलाघवम् ।। 19 ।।   भावार्थ :- स्वामी स्वात्माराम आसन को हठयोग के पहले अंग के रूप में मानते हैं । इसलिए सबसे पहले उसी का वर्णन करते हैं । आसन के वर्णन के साथ ही उससे मिलने वाले लाभ के बारे में बताते हुए कहते हैं

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Hatha Pradipika Ch. 1 [19-20]