उज्जायी प्राणायाम मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनै: । यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् ।। 51 ।। भावार्थ :- मुख को बन्द करके इड़ा व पिंगला नाडियों ( दोनों नासिकाओं ) से वायु को धीरे- धीरे अन्दर भरें । जब वायु को अन्दर भरें तब गले से लेकर हृदय प्रदेश तक वायु के स्पर्श …
प्राण व अपान की साधना का फल अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कण्ठादधो नयेत् । योगी जराविमुक्त: सन् षोडशाब्दवया भवेत् ।। 47 ।। भावार्थ :- अपान वायु ( नीचे की वायु ) को ऊपर उठाकर और प्राण वायु को कण्ठ प्रदेश से नीचे की ओर ले जाने की साधना करने से बूढ़ा व्यक्ति भी अपने बुढ़ापे …
आठ प्रकार के कुम्भक ( प्राणायाम ) सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतली तथा । भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुम्भका: ।। 44 ।। भावार्थ :- सूर्यभेदी, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्च्छा व प्लाविनी ये आठ प्रकार के कुम्भक अर्थात प्राणायाम कहे गए हैं । बन्ध का प्रयोग पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिध: । कुम्भकान्ते …
विधिवत् प्राणसंयामैर्नाडीचक्रे विशोधिते । सुषुम्नावदनं भित्वा सुखाद्विशति मारुत: ।। 41 ।। मारुते मध्यसंचारे मन:स्थैर्यं प्रजायते । यो मन: सुस्थिरीभाव: सैवावस्था मनोन्मनी ।। 42 ।। भावार्थ :- प्राणायाम को विधिपूर्वक करने से जब हमारा नाड़ी समूह शुद्ध हो जाता है । तब प्राणवायु सुषुम्ना नाड़ी के मुख का भेदन करके उसके अन्दर प्रवेश कर जाता …
प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति । आचार्याणां तु केषाञ्चिदन्यत् कर्म न संमतम् ।। 38 ।। भावार्थ :- कुछ योग आचार्यों का मानना है कि प्राणायाम के द्वारा ही शरीर के सभी दोष अथवा विकारों की समाप्ति हो जाती है । अतः षट्कर्म आदि शुद्धि क्रियाओं को करने की कोई आवश्यकता नहीं है । …
