सात्त्विक दान = योग्य व्यक्ति, समय व स्थान पर कर्तव्य भावना से दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ।। 20 ।। व्याख्या :- जो दान उपयुक्त देश ( स्थान ), काल ( समय ) और पात्र ( योग्य व्यक्ति ) को बिना उपकार की भावना के …
सात्त्विक तप = श्रद्धा व फलासक्ति रहित श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।। 17 ।। व्याख्या :- ऊपर वर्णित शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपों को जब योगयुक्त पुरुषों द्वारा फल की इच्छा से रहित व परम श्रद्धा से युक्त होकर किया जाता है, तब वह सात्त्विक तप …
कायिक ( शरीर से सम्बंधित ) तप देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।। 14 ।। व्याख्या :- देवताओं, ब्राह्मणों, गुरुजनों और विद्वानों की पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा से युक्त होकर किए जाने वाले तप शारीरिक तप कहलाते हैं । वाचिक ( वाणी से सम्बंधित ) …
सात्त्विक यज्ञ अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। 11 ।। व्याख्या :- जो यज्ञ फल की इच्छा से रहित शास्त्र विधि के अनुसार है, कर्तव्य भावना और एकाग्र मन के साथ किया गया है, वह सात्त्विक यज्ञ कहलाता है । विशेष :- फल की …
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ।। 7 ।। व्याख्या :- जिस प्रकार सभी मनुष्यों को अपनी अलग – अलग रुचि के अनुसार तीन प्रकार का आहार प्रिय होता है, उसी प्रकार यज्ञ, तप तथा दान भी तीन- तीन प्रकार के भेद वाले होते हैं । अब इनके …
