मत्स्येंद्रासन वर्णन उदरं पश्चिमाभासं कृत्वा तिष्ठति यत्नतः । नम्राङ्गं वामपादं हि दक्षजानूपरि न्यसेत् ।। 23 ।। तत्र याम्यं कूपरञ्च याम्यं करे च वक्त्रकम् । भ्रुवोर्मध्ये गतां दृष्टिं पीठं मात्स्येन्द्रमुच्यते ।। 24 ।। भावार्थ :- अपने पेट को पीछे पीठ ( कमर ) की ओर ले जाने का प्रयास करें और बायें पैर को …
वीरासन वर्णन एकपादमथैकस्मिन्विन्यसेदूरूसंस्थितम् । इतरस्मिंस्तथा पश्चाद्वीरासनमितीरितम् ।। 17 ।। भावार्थ :- एक पैर के पँजे को उल्टा करके दूसरे पैर की जँघा पर रखें ( जिस पैर के पँजे को जँघा पर रखा है उसके घुटने को जमीन पर टिकाकर रखना चाहिए ) । फिर उस दूसरे पैर को पीछे की ओर रखें …
मुक्तासन वर्णन पायुमूले वामगुल्फं दक्षगुल्फं तथोपरि । समकायशिरोग्रीवं मुक्तासनन्तु सिद्धि दम् ।। 11 ।। भावार्थ :- पैर की बायीं ऐड़ी को गुदाद्वार में लगाकर उसके ऊपर दायें पैर की एड़ी को रखें । सिर व गर्दन को बिना हिलायें बिलकुल सीधी करके बैठना मुक्तासन कहलाता है । यह मुक्तासन साधक को अनेक प्रकार …
सिद्धासन वर्णन योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं संपीड्य गुल्फेतरम् मेढ्रे सम्प्रणिधाय तं तु चिबुकं कृत्वा हृदि स्थापितम् । स्थाणु: संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तरमेवंमोक्षविधायतेफलकरं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। 7 ।। भावार्थ :- एक पैर की एड़ी ( विशेषतः बायें पैर की ) से योनिस्थान ( अंडकोशों के नीचे ) को दबायें । दूसरे पैर की एड़ी को लिङ्गमूल ( स्वाधिष्ठान …
द्वितीय अध्याय ( आसन वर्णन ) घेरण्ड संहिता के दूसरे अध्याय में सप्तांग योग के दूसरे अंग अर्थात् आसन का वर्णन किया गया है । घेरण्ड ऋषि ने आसनों के बत्तीस ( 32 ) प्रकारों को माना है । घेरण्ड संहिता के अनुसार आसन करने से साधक के शरीर में दृढ़ता ( मजबूती ) आती …
