जालन्धर बन्ध विधि व फल वर्णन   कण्ठ सङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत् । जालन्धर कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम् । जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी ।। 12 ।। सिद्धं जालन्धरं बन्धं योगिनां सिद्धिदायकम् । षण्मासमभ्सद्यो यो हि स सिद्धो नात्र संशय: ।। 13 ।।   भावार्थ :- किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर अपने कण्ठ को सिकोड़कर ठुड्डी को

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Gheranda Samhita Ch. 3 [12-17]

महामुद्रा विधि वर्णन   पायुमूलं वाम गुल्फे सम्पीड्य दृढ़यत्नतः । याम्यपादं प्रसार्याथ करे धृतपदाङ्गुल: ।। 6 ।। कण्ठ सङ्कोचनं कृत्वा भ्रुवोर्मध्ये निरीक्षीयत् । महामुद्राभिधा मुद्रा कथ्यते चैव सूरिभि: ।। 7 ।।   भावार्थ :-  बायें पैर की एड़ी को गुदाद्वार के मूल भाग ( अंडकोशों व गुदाद्वार के बीच में ) पर पूर्ण प्रयास के

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Gheranda Samhita Ch. 3 [6-11]

तृतीय अध्याय ( मुद्रा प्रकरण )   घेरण्ड संहिता के तीसरे अध्याय का विषय मुद्रा है । जिसमें ऋषि घेरण्ड ने सिद्धियों की प्राप्ति के लिए पच्चीस मुद्राओं का वर्णन किया है । मुद्रा के फल को बताते हुए कहा है कि मुद्राओं का अभ्यास करने से साधक को स्थिरता प्राप्त होती है ।  

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Gheranda Samhita Ch. 3 [1-5]

गरुड़ासन वर्णन   जंघोंरुभ्यां धरां पीड्य स्थिरकायो द्विजानुनी । जानूपरि करयुग्मं गरुड़ासनमुच्यते ।। 36 ।।   भावार्थ :-  दोनों जाँघों व घुटनों से भूमि को दबाते हुए दोनों हाथों घुटनों के ऊपर हाथों को टिकाकर रखना गरुड़ासन कहलाता है ।     विशेष :- गरुड़ासन में गरुड़ शब्द का अर्थ गरुड़ नामक पक्षी होता है

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Gheranda Samhita Ch. 2 [36-44]

मयूरासन वर्णन   धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्यां तत्कूर्परे स्थापितनाभिपार्श्वम् । उच्चासनो दण्डवदुत्थित: खे मायूरमेतत्प्रवदन्ति पीठम् ।। 29 ।।   भावार्थ :-  दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर मजबूती के साथ रखते हुए दोनों कोहनियों को नाभि प्रदेश के दोनों तरफ ( दायीं व बायीं ओर ) रखकर पूरे शरीर को दोनों कोहनियों पर डण्डे के समान

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Gheranda Samhita Ch. 2 [29-35]