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  • Gheranda Samhita Ch. 3 [12-17]

जालन्धर बन्ध विधि व फल वर्णन

 

कण्ठ सङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत् ।

जालन्धर कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम् ।

जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी ।। 12 ।।

सिद्धं जालन्धरं बन्धं योगिनां सिद्धिदायकम् ।

षण्मासमभ्सद्यो यो हि स सिद्धो नात्र संशय: ।। 13 ।।

 

भावार्थ :- किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर अपने कण्ठ को सिकोड़कर ठुड्डी को छाती पर लगाने को जालन्धर बन्ध कहते हैं । यह शरीर में स्थित सभी सोलह आधारों को बन्ध करता है अर्थात् इसके करने से सभी आधारों में भी अपने आप ही बन्ध लग जाता है । जालन्धर बन्ध नामक श्रेष्ठ मुद्रा के अभ्यास से मृत्यु का भी नाश हो जाता है । यदि निरन्तर छ: महीने तक जालन्धर बन्ध का अभ्यास किया जाए तो यह साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है । छ: महीने के अभ्यास से जालन्धर बन्ध सिद्ध हो जाता है । इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह अथवा शक नहीं है ।

 

 

विशेष :- जालन्धर बन्ध के सम्बंध में यह पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा अथवा बन्ध का अभ्यास करने से शरीर में स्थित सभी सोलह आधारों को बांधा अथवा स्थिर किया जा सकता है ? जिसका उत्तर जालन्धर बन्ध है । दूसरा यह भी पूछा जा सकता है कि किस मुद्रा या बन्ध में सोलह आधारों का वर्णन किया गया है ? या पूछा जा सकता है कि जालन्धर बन्ध के अनुसार शरीर में कितने आधार माने गए हैं ? उत्तर है सोलह ( 16 ) । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि जालन्धर बन्ध कितने समय में सिद्ध हो जाता है ? उत्तर है छ: महीने में । ऊपर वर्णित प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी हैं ।

 

 

मूलबन्ध विधि व फल वर्णन

 

पार्ष्णिना वामपादस्य योनिमाकुञ्चयेत्तत: ।

नाभिग्रन्थिं मेरुदण्डे सम्पीड्य यत्नतः सुधी: ।। 14 ।।

मेढ्रं दक्षिणगुल्फे तु दृढबन्धं समाचरेत् ।

जराविनाशिनी मुद्रा मूलबन्धो निगद्यते ।। 15 ।।

संसारसमुद्रं तर्त्तमभिलषति य: पुमान् ।

विरलेसुगुप्तो भूत्वा मुद्रामेनां समभ्यसेत् ।। 16 ।।

अभ्यासाद् बन्धनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।

साधयेद् यत्नतो तर्हि मौनी तु विजितालस: ।। 17 ।।

 

भावार्थ :-  बुद्धिमान साधक पहले बायें पैर की एड़ी से योनिस्थान ( अंडकोशों के नीचे का स्थान ) को दबाते हुए अपने नाभि प्रदेश व मेरुदण्ड ( रीढ़ की हड्डी ) को प्रयत्नपूर्वक सीधा तानकर रखें । इसके बाद अपने दायें पैर की एड़ी से अपने लिङ्ग को अच्छी तरह से दबाकर रखें अर्थात् एड़ी को लिङ्ग के ऊपर स्थापित कर देना चाहिए । इस प्रकार यह मूलबन्ध नामक मुद्रा साधक के बुढ़ापे को खत्म करने वाली होती है । जो भी व्यक्ति इस जीवन रूपी समुन्द्र को पार करने की इच्छा रखता है, उसे कहीं एकांत स्थान पर जाकर स्थिर मन द्वारा इस मूलबन्ध मुद्रा का अच्छी प्रकार से अभ्यास करना चाहिए । इस मुद्रा के अभ्यास से साधक के सभी बन्धनों का नाश होता है और प्राण वायु की सिद्धि प्राप्त होती है । अतः योग साधक को मौन भाव से युक्त होकर आलस्य को पूरी तरह से त्यागते हुए इस भली- भाँति इस मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए ।

 

 

विशेष :- मूलबन्ध के अभ्यास से योगी को कभी बुढ़ापा नहीं आता व उसके सभी बन्धन समाप्त हो जाते हैं । साथ ही इसके अभ्यास से साधक संसार रूपी सागर को पार कर लेता है ।

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  1. ॐ गुरुदेव!
    अति सुंदर व्याख्या।
    आपको हृदय से आभार।

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