दुःख व क्लेश के डर से निश्चित कर्मों का त्याग = राजसिक त्याग दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ।। 8 ।। व्याख्या :- जो व्यक्ति शरीर को होने वाले कष्ट व दुःख से भयभीत होकर निश्चित कर्मों का त्याग करता है, उस त्याग को राजसिक त्याग …
निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ।। 4 ।। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।। 5 ।। व्याख्या :- हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! हे पुरुष व्याघ्र ! ( पुरुषों में श्रेष्ठ ) त्याग के विषय में तुम मेरे निश्चय …
अठारहवां अध्याय ( मोक्ष- संन्यासयोग ) यह गीता का अन्तिम व सबसे बड़ा अध्याय है । जिसमें कुल अठत्तर ( 78 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । इस अध्याय में पूरी गीता का सार भरा हुआ है । इसको गीता का उपसंहार भी कहा जाता है । यहाँ पर एक प्रकार से पूरी …
सत् = सत्य ( सर्वहितकारी ) सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ।। 26 ।। व्याख्या :- सत् शब्द का प्रयोग साधुभाव अर्थात् सबकी भलाई व सत्य के रूप में किया जाता है तथा सभी उत्तम अथवा श्रेष्ठ कार्यों के लिए भी सत् शब्द का प्रयोग …
ॐ तत् सत् = ब्रह्म स्वरूप ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ।। 23 ।। तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम् ।। 24 ।। व्याख्या :- ‘ॐ तत् सत्’ नामक तीन शब्दों द्वारा ब्रह्म को निर्देशित किया गया है अर्थात् ब्रह्म को इन तीन …
