स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण हैं ? अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।। 54 ।। व्याख्या :- अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछता है कि हे केशव ! आप मुझे यह बताइये कि स्थितप्रज्ञ अथवा समाधिस्थ साधक की क्या परिभाषा या लक्षण होते हैं ? वह …
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।। 51 ।। व्याख्या :- समबुद्धि से युक्त मनीषी अथवा ऋषिगण प्रत्येक कर्म ( कार्य ) को फल की आसक्ति ( इच्छा ) से रहित होकर करते हैं । जिससे वह जन्म- मरण के बन्धन व दुःखों अथवा शोक से पूरी तरह मुक्ति …
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।। 50 ।। व्याख्या :- जो व्यक्ति समबुद्धि से युक्त होकर कार्य करता है । वह इस संसार में सभी पाप व पुण्य कर्मों से रहित हो जाता है । इसलिए हमें समबुद्धि का सहारा लेकर ही सभी कार्य करने चाहिए । इस प्रकार …
योग की परिभाषा ( समत्वं योग ) योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। 48 ।। व्याख्या :- हे धनंजय ! तुम योग में पूरी तरह से स्थित होकर ( अपने चित्त को सम अवस्था में रखकर ) फल की इच्छा को त्यागकर कार्य की सिद्धि …
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ 45 ।। व्याख्या :- हे अर्जुन ! वेदों में त्रिगुणों ( सत्त्व, रज व तम ) के विषय अर्थात् इन गुणों से प्राप्त होने वाले फलों के बारे में बताया गया है । तुम इन तीनों गुणों से मुक्त ( रहित ) हो …
