जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ।। 29 ।। व्याख्या :- जो भक्त मेरा आश्रय लेकर बुढ़ापे और मृत्यु से छूटकर मोक्ष पाने का प्रयत्न करते हैं, वह ब्रह्मा को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कर्मों के रहस्यों को जान लेते हैं । साधिभूताधिदैवं …
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।। 24 ।। व्याख्या :- मन्दबुद्धि अथवा कमबुद्धि वाले व्यक्ति मेरे अविनाशी और अत्युत्तम ( अति उत्तम ) स्वरूप को न जानकर, मेरे व्यक्त स्वरूप ( दिखाई देने वाले शरीर ) को ही मेरा स्वरूप समझने की भूल कर बैठते हैं । नाहं …
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।। 20 ।। व्याख्या :- कामनाओं अथवा इच्छाओं ने जिनके ज्ञान को अपने अधीन कर लिया है । वह सभी अपने- अपने स्वभाव अथवा प्रकृति के वशीभूत होकर अपनी- अपनी आस्था के अनुसार नियमों का पालन करके अपने – अपने देवता की पूजा- उपासना …
सबसे उत्तम अथवा प्रिय भक्त ( ज्ञानी ) तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।। 17 ।। व्याख्या :- इनमें ( चारों प्रकार के भक्तों में ) से जो ज्ञानी भक्त प्रतिदिन निष्काम भाव से युक्त होकर, अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है, वह भक्त …
चार प्रकार के भक्त चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।। 16 ।। व्याख्या :- हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! चार प्रकार के भक्त मेरा भजन अर्थात् भक्ति करते हैं – आर्त ( दुःख अथवा संकट से छुटकारा चाहने वाले ), जिज्ञासु ( ज्ञान अथवा रहस्य …
