नौवां अध्याय ( राजविद्या- राजगुह्ययोग ) इस अध्याय में कुल चौतीस ( 34 ) श्लोकों के द्वारा राजगुह्य योग विद्या का वर्णन किया गया है । राजगुह्य योग की उपयोगिता को बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस योग को जानने से व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है । इसे सभी विद्याओं का …
उत्तम पुरुष = ईश्वर ( परमात्मा ) उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।। 17 ।। व्याख्या :- इन दोनों पुरुषों से भिन्न उस उत्तम पुरुष को परमात्मा कहते हैं, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पोषण करता है, उसी अविनाशी पुरुष को ईश्वर कहते हैं । …
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।। 13 ।। व्याख्या :- मैं ही इस पृथ्वी में प्रवेश करके अपने सामर्थ्य से सभी प्राणियों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा बनकर सभी फूलों और औषधियों में रस का संचार करके उनका पोषण करता हूँ । …
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ।। 9 ।। व्याख्या :- यह जीवात्मा कान, नेत्र, त्वचा, जीभ व नासिका ( पंच ज्ञानेन्द्रियों ) और एक मन का आश्रय ( सहारा ) लेकर स्वामी रूप में सभी विषयों का सेवन करता है अथवा सभी विषय भोगों को भोगता है …
परमपद प्राप्ति निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।। 5 ।। व्याख्या :- जो मान व मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने सङ्ग रूपी ( आसक्ति ) दोष पर विजय प्राप्त कर ली है, जो सभी कामनाओं से निवृत्त होकर निरन्तर आध्यात्मिक ज्ञान में स्थिर रहते हैं और जो सुख- दुःख …
