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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 6 [4-6]

अध्याय 6: आत्मसंयमयोग

विषयों व कर्मफल की आसक्ति का त्याग = योग सिद्धि

मूल श्लोक · 6.4

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ।। 4 ।।

व्याख्या

जब साधक इन्द्रियों के विषयों व कर्मफल की आसक्ति का त्याग कर देता है, तब वह सभी कामनाओं अथवा इच्छाओं का त्याग करने वाला साधक योगारूढ़ अर्थात् योगी कहलाता है ।

विशेष

अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर, कर्मफल की आसक्ति का त्याग करने वाला व अपनी सभी इच्छाओं को त्याग करने वाला साधक ही योगी कहलाता है । जब तक कोई साधक अपनी इन्द्रियों को विषयों से विमुख करके, कर्मफल में अनासक्त होकर, अपनी सभी इच्छाओं का त्याग नहीं कर देता है, तब तक उसे योगी नहीं कहा जा सकता । इसलिए योगमार्ग में आरूढ़ होने के लिए साधक को प्रत्याहार, कर्मफल में आसक्ति व सभी कामनाओं का त्याग करना पड़ेगा, तभी कोई साधक सच्चे अर्थों में योगी बन सकता है ।

मूल श्लोक · 6.5

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।। 5 ।।

व्याख्या

योगी साधक को स्वयं ही अपनी आत्मा का उद्धार अथवा उत्थान करते हुए, उसे कभी भी अवसादग्रस्त नहीं होने देना चाहिए । मनुष्य अपनी आत्मा अथवा अपना स्वयं ही मित्र और स्वयं ही शत्रु होता है । अतः योगी साधक को अपने उत्थान के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए ।

मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु होता है -

मूल श्लोक · 6.6

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ।। 6 ।।

व्याख्या

जिस मनुष्य ने अपने मन, इन्द्रियों व आत्मा को अपने वश अर्थात् नियंत्रण में कर लिया है, वह स्वयं ही अपना मित्र होता है और जो अपने मन, इन्द्रियों व आत्मा को अपने नियंत्रण में नहीं कर पाता, वह स्वयं के साथ शत्रु की तरह ही व्यवहार करता है अर्थात् वह स्वयं ही अपना शत्रु अथवा दुश्मन होता है ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Guru ji nice explain about yoga siddi short way.

  2. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    बहुत सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत की है।

    आपको हृदय से परम आभार प्रेषित करता हूं।