क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतु: ।। 15 ।। शब्दार्थ :- क्रम ( क्रम ) अन्यत्वम् ( भिन्नता या अन्तर ) परिणाम ( फल या नतीजा ) अन्यत्वे ( भिन्नता या अन्तर ) हेतु ( कारण या वजह ) सूत्रार्थ :- क्रम की भिन्नता के कारण ही धर्मी के अलग- अलग परिणाम होते हैं । व्याख्या :- इस

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Yoga Sutra 3 – 15

परिणामत्रयसंयमादतीतानागत ज्ञानम् ।। 16 ।। शब्दार्थ :- परिणामत्रय ( धर्म, लक्षण व अवस्था परिणाम में ) संयमात् ( संयम करने से ) अतीत ( भूतकाल ) अनागत ( भविष्य काल का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- परिणाम वाले पदार्थों के धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम व अवस्था परिणामों में संयम करने

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Yoga Sutra 3 – 16

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतरा ध्यासात्संकरस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ।। 17 ।।   शब्दार्थ :- शब्द ( शब्द या अक्षर ) अर्थ ( उसका अभिप्राय या मतलब ) प्रत्ययानाम् ( ज्ञान या जानकारी को ) इतरेतर ( आपस में ) अध्यासात् ( अध्यास अर्थात जुड़े होने से ) संकर: ( उनका एक दूसरे के साथ मिश्रण अर्थात वो एक दूसरे के साथ

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Yoga Sutra 3 – 17

संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ।। 18 ।।   शब्दार्थ :- संस्कार ( संस्कारों या अनुभवों का ) साक्षात् ( उनका प्रत्यक्षीकरण या साक्षात्कार ) करणात् ( में संयम करने से ) पूर्व ( पूर्व अर्थात पिछले ) जाति ( जाति अर्थात जन्म का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )   सूत्रार्थ :- योगी द्वारा संयम के

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Yoga Sutra 3 – 18

प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ।। 19 ।। शब्दार्थ :- प्रत्ययस्य ( दूसरे के ज्ञान में संयम करने पर ) पर ( दूसरे के ) चित्त ( चित्त का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )   सूत्रार्थ :- दूसरे के ज्ञान में संयम करने पर योगी को दूसरे के चित्त का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता

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Yoga Sutra 3 – 19

न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ।। 20 ।।   शब्दार्थ :- च ( लेकिन ) तत् ( वह अर्थात वह ज्ञान ) सालम्बनम् ( आलम्बन के साथ ) न ( नही होता ) तस्याविषयीभूतत्वात् ( क्योंकि वह योगी के संयम का विषय नहीं है )   सूत्रार्थ :- लेकिन योगी को वह ज्ञान आलम्बन ( आश्रय

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Yoga Sutra 3 – 20

कायरूपसंयमात्  तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षु:प्रकाशासम्प्रयोगेऽन्तर्द्धानम् ।।  21 ।। शब्दार्थ :- काय ( काया अर्थात शरीर ) रूप ( शरीर की आकृति ) संयमात् ( में संयम करने से ) तद् ( जब ) ग्राह्यशक्ति ( जिस ताकत या शक्ति के माध्यम से देखा जाए ) स्तम्भे ( वह रुक अथवा बाधित हो जाती है ) चक्षु: (

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Yoga Sutra 3 – 21