तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ।। 8 ।।   शब्दार्थ :- तदपि ( वह भी अर्थात धारणा, ध्यान व समाधि भी ) निर्बीजस्य ( निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात समाधि के )  बहिरङ्गं ( बाहरी साधन हैं । )   सूत्रार्थ :- वह धारणा, ध्यान व समाधि भी निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात समाधि के बाहरी साधन हैं ।    व्याख्या

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Yoga Sutra 3 – 8

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ  निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोध परिणाम: ।। 9 ।।   शब्दार्थ :- व्युत्थान ( चित्त की वह अवस्था जिसमें संस्कार प्रभावी होते हैं । ) निरोध ( वह अवस्था जिसमें संस्कार दब जाते हैं । ) संस्कारयो: ( विचार या घटनाओं की स्मृति या याददाश्त ) अभिभव ( छिपना या दबना ) प्रादुर्भावौ ( उभरना या प्रकट

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Yoga Sutra 3 – 9

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ।। 10 ।।   शब्दार्थ :- संस्करात् ( संस्कारों के प्रभाव से ) तस्य ( उसकी अर्थात चित्त की ) वाहिता ( स्थिति या अवस्था ) प्रशान्त ( बिलकुल शान्त होती है । )   सूत्रार्थ :- संस्कारो के प्रभाव से चित्त की स्थिति बिलकुल शान्त हो जाती है । अर्थात उस

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Yoga Sutra 3 – 10

सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणाम: ।। 11 ।।   शब्दार्थ :- सर्वार्थता ( चित्त का चंचल होना ) एकाग्रतयो: ( चित्त का स्थिर हो जाना ) क्षय  ( नाश होना ) उदयौ  ( विकास होना ) चित्तस्य  ( चित्त का ) समाधिपरिणाम: ( समाधि का फल है । )   सूत्रार्थ :- चित्त की चंचल अवस्था

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Yoga Sutra 3 – 11

तत: पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चितस्यैकाग्रता परिणाम: ।। 12 ।।   शब्दार्थ :- तत:  ( उसके बाद ) पुनः  ( फिर से ) शान्त ( शान्त रहने वाली ) उदितौ ( उभरने या बढ़ने वाली ) तुल्य ( एक समान या एक जैसी ) प्रत्ययौ ( ज्ञान वाली अवस्था ) चित्तस्य ( चित्त की ) एकाग्रता

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Yoga Sutra 3 – 12

एतेन  भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता: ।। 13 ।।   शब्दार्थ :- एतेन ( इनसे ) भूत ( भूतों अर्थात आकाश, वायु आदि पंच महाभूत ) इन्द्रियेषु ( इन्द्रियों अर्थात आँख, नाक आदि में ) धर्मलक्षणावस्थापरिणामा ( धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम, व अवस्था परिणाम ) व्याख्याता ( कहे हुए मानने चाहिए )   सूत्रार्थ :- जिस प्रकार

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Yoga Sutra 3 – 13

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपातीधर्मी ।। 14 ।।   शब्दार्थ :- शान्त ( अतीत या भूतकाल में ) उदित ( वर्तमान में ) अव्यपदेश्य ( भविष्य में ) धर्मानुपाती ( सभी धर्मों में विद्यमान रहने वाला ) धर्मी ( वह धर्मी होता है )   सूत्रार्थ :- किसी भी पदार्थ के अतीत, वर्तमान व भविष्य धर्मों में सदा विद्यमान

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Yoga Sutra 3 – 14