सात्त्विक कर्म नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ।। 23 ।। व्याख्या :- जो कर्म शास्त्रों के अनुसार आसक्ति, राग, द्वेष व फल की इच्छा से रहित होकर किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है । राजसिक कर्म यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते …
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- Category: Bhagwad Geeta








