सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌ ।। 7 ।।     व्याख्या :-  हे कौन्तेय ! कल्प ( सृष्टि के प्रलयकाल ) के समय यह सारा जगत् नष्ट होकर, मुझमें ही विलीन हो जाते हैं अर्थात् यह सभी मुझमें ही आ मिलते हैं और कल्प के आदि ( सृष्टि के आदि

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [7-10]

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌ । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌ ।। 11 ।। मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ।। 12 ।।       व्याख्या :-  अज्ञानी लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वर वाले वास्तविक स्वरूप को न जानकर, मुझे सामान्य शरीर वाला मनुष्य समझकर मेरी अवहेलना करते हैं ।

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [11-14]

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 15 ।।     व्याख्या :-  अन्य भक्तों के अलावा ज्ञानी योगी भी मेरी पूजा- उपासना करते हैं, इस विश्व में कुछ भक्त एक तत्त्व रूप में ( अभेद रूप में अथवा एक रूप में ) ही मेरी उपासना करते हैं अथवा मुझे भजते हैं,

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [15-19]

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌ ।। 20 ।।     व्याख्या :-  तीनों वेदों को जानने वाले, सोम रस पीने वाले और निष्पापी (सदा पुण्य कर्म करने वाले ) लोग यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग आदि को प्राप्त करने के लिए मेरी प्रार्थना करते हैं । मुझे पूजने

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [20-24]

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌ ।। 25 ।।       व्याख्या :-  देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त करते हैं, पितरों ( पूर्वजों ) को पूजने वाले पितरों को, भूतों ( सामान्य प्राणियों ) को पूजने वाले सामान्य प्राणियों को और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे प्राप्त

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [25-28]

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ।। 29 ।।       व्याख्या :-  मैं सभी प्राणियों को समान भाव से देखता हूँ । मुझे न तो किसी प्राणी से द्वेष है और न ही किसी प्राणी से प्रेम है । जो भी भक्त

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Bhagwad Geeta Ch. 9 [29-34]

चौदहवां अध्याय ( गुणत्रय विभागयोग ) इस चौदहवें अध्याय में मुख्य रूप से गुणों के विभागों ( सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण ) की चर्चा की गई है । इसमें कुल सत्ताईस ( 27 ) श्लोक कहे गए हैं । गुणों के विषय में कहा गया है कि पूरी प्रकृति इन तीन गुणों से ही निर्मित

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Bhagwad Geeta Ch. 14 [1-3]