सात्त्विक कर्ता के लक्षण   मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ।। 26 ।।     व्याख्या :-  जो कर्ता आसक्ति और अहंकार से मुक्त होकर धैर्य तथा उत्साह के साथ कार्य की सफलता और असफलता में स्वयं को निर्विकार ( समभाव ) बनाए रखता है, उसे सात्त्विक कर्ता कहते हैं ।    

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [26-28]

बुद्धि और धृति के भेद   बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ।। 29 ।।     व्याख्या :-  हे धनंजय ! गुणों के आधार पर बुद्धि और धृति के भी तीन अलग – अलग भेद होते हैं । अब तुम इनको सम्पूर्णता के साथ सुनो ।     विशेष :- गुणों के

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [29-32]

सात्त्विक धृति के लक्षण   धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ।। 33 ।।     व्याख्या :-  हे पार्थ ! जिस योग ( ध्यानयोग ) और अपने स्थान पर अडिग रहने वाली धृति के द्वारा साधक अपने मन, प्राण और इन्द्रियों की सभी क्रियाओं को धारण कर लेता है, उसे

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [33-35]

सात्त्विक सुख के लक्षण   सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ।। 36 ।। यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌ । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌ ।। 37 ।।     व्याख्या :-  हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! अब तुम मुझसे सुख के भी तीन भेदों ( सात्त्विक, राजसिक व तामसिक ) को सुनो –

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [36-39]

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः ।। 40 ।।       व्याख्या :-  इस पृथ्वी, आकाश, देवताओं तथा इनके भी अलावा कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो कि प्रकृति के सत्त्व, रज व तम नामक गुणों से मुक्त अथवा रहित हो अर्थात् पृथ्वी, आकाश, देवता व अन्य सभी

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [40-45]

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌ । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।। 46 ।।     व्याख्या :-  जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिसमें यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, मनुष्य उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों से वन्दना ( पूजा ) करके परम सिद्धि को प्राप्त करता है ।      स्वधर्म

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [46-49]

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ।। 50 ।।     व्याख्या :-  हे कौन्तेय ! मनुष्य इस निष्काम कर्म नामक श्रेष्ठ सिद्धि को प्राप्त करके, किस प्रकार ज्ञानयोग की पराकाष्ठा द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं ? उस विधि को तुम मुझसे सार रूप में जान

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [50-53]