कृतर्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ।। 22 ।।   शब्दार्थ :- कृतार्थं, ( मुक्ति अथवा मोक्ष प्राप्त कर चुका पुरूष ) प्रति, ( के लिए ) नष्टम्, ( नष्ट अर्थात खत्म हुई ) अपि, ( भी ) अनष्टम्, ( कभी नष्ट या खत्म न होने वाली ) तद् -अन्य, ( उससे अर्थात मुक्त पुरूष से भिन्न

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Yoga Sutra 2 – 22

स्वस्वामिशक्त्यो: स्वरूपोपलब्धिहेतु: संयोग: ।। 23 ।।   शब्दार्थ :- स्व शक्त्यो:, ( प्रकृत्ति ) स्वामि शक्त्यो:, ( पुरुष ) स्वरूपोपलब्धि, ( स्वरूप की प्राप्ति का ) हेतु:, ( कारण ही ) संयोग:, ( संयोग अर्थात जुड़ाव है । )   सूत्रार्थ :- प्रकृत्ति और उस पुरूष के स्वरूप की प्राप्ति के लिए ही इनका संयोग अर्थात

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Yoga Sutra 2 – 23

तस्य हेतुरविद्या ।। 24 ।।   शब्दार्थ :- तस्य, ( उसका अर्थात प्रकृत्ति व पुरुष के संयोग का ) हेतु:, ( कारण ) अविद्या, ( वह अविद्या अर्थात मिथ्याज्ञान ही है । )   सूत्रार्थ :- उस प्रकृत्ति व पुरुष के संयोग का कारण वह अविद्या रूपी क्लेश ही है ।   व्याख्या :- इस

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Yoga Sutra 2 – 24

तदभावात्संयोगाभावो हानं तद् दृशे: कैवल्यम् ।। 25 ।।   शब्दार्थ :- तद्, ( उस अविद्या का ) अभावत्, ( अभाव होने से ) संयोग, ( उस दृश्य व दृष्टा के संयोग का भी ) आभव:, ( अभाव हो जाता है ) हानं, ( दुःख से निवृत्ति या दुःख का अभाव ) तत्, ( वही )

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Yoga Sutra 2 – 25

विवेकख्यातिरविप्लवा हनोपाय: ।। 26 ।।   शब्दार्थ :- अविप्लवा ( दोष रहित और निश्चित ) विवेकख्याति ( प्रकृत्ति व पुरुष के भेद का ज्ञान या विवेक ज्ञान की अवस्था ) हनोपाय: ( दुःख निवृति या मोक्ष का उपाय है । )   सूत्रार्थ :- प्रकृत्ति व पुरूष के भेद का निश्चित व दोष रहित ज्ञान

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Yoga Sutra 2 – 26

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमि: प्रज्ञा ।। 27 ।।    शब्दार्थ :- तस्य, ( उसकी ) सप्तधा ( सात प्रकार की ) प्रान्तभूमि: ( अन्तिम अवस्था वाली ) प्रज्ञा ( बुद्धि होती है । )   सूत्रार्थ :- उस विवेकख्याति को प्राप्त योगी की सात प्रकार की सबसे उत्कृष्ट अर्थात ऊँची बुद्धि होती है ।   व्याख्या

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Yoga Sutra 2 – 27

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञान दीप्तिराविवेकख्याते: ।। 28 ।।   शब्दार्थ :- योगाङ्ग: ( योग के अंगों का ) अनुष्ठानात् ( पालन करने से ) अशुद्धि ( अशुद्धि अर्थात गन्दगी का ) क्षये, ( नाश होने से ) ज्ञानदीप्ति: ( ज्ञान के प्रकाश का उदय ) आविवेकख्याते: ( विवेकज्ञान की प्राप्ति तक होता है । )   सूत्रार्थ

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Yoga Sutra 2 – 28