परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिन: ।। 15 ।।   शब्दार्थ :- परिणाम दुःख, ( भौतिक सुखों को भोगने के बाद राग से उत्पन्न दुःख ) ताप दुःख, ( सुख में बाधा डालने वाले के प्रति द्वेष करने से उत्पन्न दुःख ) संस्कार दुःख, ( सुख व दुःख के संस्कार बनने से सुख की इच्छा पूरी न

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Yoga Sutra 2 -15

हेयं दुःखमनागतम् ।। 16 ।।   शब्दार्थ :- दुःखम्, ( जो दुःख ) अनागतम्, ( अभी तक आया ही नहीं है ) हेयं, ( वही त्यागने योग्य है  या उससे ही बचा जा सकता है )   सूत्रार्थ :- जो दुःख हमें अभी तक नहीं मिला है अर्थात भविष्य में आने वाला जो दुःख है

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Yoga Sutra 2 – 16

द्रष्ट्टदृश्ययो: संयोगो हेयहेतु: ।। 17 ।।   शब्दार्थ :- द्रष्ट्ट, ( देखने वाला अर्थात पुरुष ) दृश्ययो:, ( प्रकृत्ति का ) संयोग:, ( मिलाप / मिलना ) हेय, ( त्यागने का ) हेतु:, ( कारण है । )   सूत्रार्थ :- जीवात्मा और प्रकृत्ति का आपस में जो अज्ञानता पूर्ण सम्बन्ध है वह त्यागने योग्य

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Yoga Sutra 2 – 17

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थां दृश्यम् ।। 18 ।।   शब्दार्थ :- प्रकाश, ( सत्त्वगुण ) क्रिया, ( रजोगुण ) स्थिति, ( तमोगुण ) शीलम्, ( स्वभाव ) भूत, ( सूक्ष्म ) इन्द्रिय, ( स्थूल ) आत्मकम्, ( स्वरूप ) भोग, ( जीवन ) अपवर्ग, ( मुक्ति ) अर्थम्, ( अर्थ या प्रयोजन है ) दृश्यम्, (

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Yoga Sutra 2 – 18

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ।। 19 ।।   शब्दार्थ :- विशेष, ( स्थूलभूत, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ व मन ) अविशेष, ( सूक्ष्मभूत या तन्मात्राएँ व अहंकार ) लिङ्गमात्र, ( महत्तत्व या बुद्धि ) अलिङ्ग, ( प्रकृत्ति ) गुण,( गुणों के) पर्वाणि, ( विभाग हैं )   सूत्रार्थ :- जो पाँच स्थूलभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ व एक मन,

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Yoga Sutra 2 – 19

द्रष्टा दृशिमात्र: शुद्धोऽपि प्रत्ययानु पश्य: ।। 20 ।।   शब्दार्थ :- द्रष्टा, ( देखने वाला अर्थात पुरूष ) दृशिमात्र:, ( चेतन अर्थात आत्मा ) शुद्ध, ( बिना विकार अथवा बिना मिलावट के ) अपि, ( भी ) प्रत्यय, ( बुद्धि के सम्पर्क से ) अनुपश्य:, ( उसी के अनुसार देखने वाला या मानने वाला )

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Yoga Sutra 2 – 20

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ।। 21 ।।   शब्दार्थ :- दृश्यस्य, ( दृश्य रूप प्रकृत्ति का ) आत्मा, ( स्वरूप ) एव, ( ही ) तदर्थ, ( उसके अर्थात दृष्टा के लिए हुआ है । )   सूत्रार्थ :- उस दृश्य रूप प्रकृत्ति का स्वरूप उस पुरूष के लिए ही है । उसका और कोई प्रयोजन

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Yoga Sutra 2 – 21