चित्तेरप्रतिसङ्क्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ।। 22 ।।   शब्दार्थ :- चित्ते: ( चेतन आत्मा अथवा पुरुष ) अप्रतिसंक्रमाया: ( किसी भी प्रकार की क्रिया व किसी भी प्रकार के संक्रमण अर्थात सङ्ग से रहित है ) तदाकार ( विषय को ग्रहण किए हुए चित्त से ) आपत्तौ ( सम्पर्क या सम्बन्ध होने से ) स्वबुद्धि ( उसे

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Yoga Sutra 4 – 22

द्रष्टृदृश्योपरक्तं  चित्तं सर्वार्थम् ।। 23 ।।   शब्दार्थ :- द्रष्टृ ( देखने वाला अर्थात आत्मा ) दृश्य ( जिसके द्वारा देखा जाता है अर्थात चित्त से ) उपरक्तम् ( सम्बन्ध या राग होने से ) चित्तं ( चित्त ) सर्व ( सभी ) अर्थम् ( अर्थों अर्थात प्रकार का हो जाता है )    

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Yoga Sutra 4 – 23

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं  संहत्यकारित्वात् ।। 24 ।।   शब्दार्थ :- तद् ( वह अर्थात वह चित्त ) असंख्येय ( अनगिनत या बहुत सारी संख्या में ) वासनाभि ( वासनाओं से ) चित्रम् ( चित्रित या युक्त होते हुए ) अपि ( भी ) परार्थं ( दूसरों अर्थात आत्मा या पुरुष के लिए होता है ) संहत्यकारित्वात्

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Yoga Sutra 4 – 24

विशेषदर्शिनआत्मभावभावनाविनिवृत्ति: ।। 25 ।।     शब्दार्थ :- विशेष ( विशिष्ट या खास ) दर्शिन: ( ज्ञान द्वारा ) आत्म ( स्वयं के ) भाव ( विषय में ) भावना ( उठने वाली जिज्ञासा अर्थात उत्सुकता ) विनिवृत्ति: ( समाप्त हो जाती है )     सूत्रार्थ :- विशेष अर्थात विवेक से उत्पन्न ज्ञान से

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Yoga Sutra 4 – 25

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ।। 26 ।।    शब्दार्थ :- तदा ( तब अर्थात योगी को विवेक ज्ञान की प्राप्ति होने पर ) चित्तम् ( उसका चित्त ) विवेकनिम्नम् ( विवेक ज्ञान के मार्ग का अनुसरण करता हुआ ) कैवल्य ( कैवल्य अर्थात मोक्ष या समाधि प्राप्त करने के लिए ) प्राग्भारम् ( उसकी ओर

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Yoga Sutra 4 – 26

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्य: ।। 27 ।।   शब्दार्थ :- तत् ( उस विवेक ज्ञान के ) छिद्रेषु ( छिद्रों अथवा उसके बीच के अन्तर से ) संस्कारेभ्य: ( पूर्व जनित संस्कारों के कारण ) प्रत्ययान्तराणि ( विवेक ज्ञान के अलावा दूसरे पदार्थों का भी ज्ञान होता रहता है )     सूत्रार्थ :- पूर्व जन्म

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Yoga Sutra 4 – 27

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ।। 28 ।।   शब्दार्थ :- एषाम् ( इन अर्थात इन पूर्व जन्म के संस्कारों का ) हानम् ( नाश ) क्लेशवत् ( क्लेशों की तरह ही ) उक्तम् ( होना कहा गया है )     सूत्रार्थ :- इन सभी पूर्व जन्म के संस्कारों का नाश भी क्लेशों की तरह ही होगा

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Yoga Sutra 4 – 28