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  • Gheranda Samhita Ch. 3 [37-48]

योनिमुद्रा विधि वर्णन

 

सिद्धासनं समासाद्य कर्णचक्षुर्नसोमुखम् ।

अङ्गुष्ठतर्जनीमध्यानामादिभिश्च साधयेत् ।। 37 ।।

काकोभि: प्राणंसङ्कृष्य अपाने योजयेत्तत: ।

षट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हुं हंसमनुना सुधी: ।। 38 ।।

चैतन्यमानयेद्धेवीं निद्रिता या भुजङ्गिनी ।

जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ।। 39 ।।

शक्तिमय: स्वयं भूत्वा परं शिवेन सङ्गमम् ।

नानासुखं विहारञ्च चिन्तयेत् परमं सुखम् ।। 40 ।।

शिवशक्ति समायोगादेकान्ते भुवि भावयेत् ।

आनन्दमानसो भूत्वा अहं ब्रह्मेति सम्भवेत् ।। 41 ।।

योनिमुद्रा परा गोप्या देवानामपि दुर्ल्लभा ।

सकृत्तु लाभसंसिद्धि: समाधिस्थ: स एव हि ।। 42 ।।

 

भावार्थ :-  योनिमुद्रा के लिए सिद्धासन में बैठकर अपने कानों, आँखों और मुहँ को अँगूठे, तर्जनी ( पहली अँगुली ), मध्यमा ( दूसरी अँगुली ) व अनामिका ( तीसरी अँगुली ) अँगुलियों से ढ़कना चाहिए ।

अब बुद्धिमान साधक काकीमुद्रा ( होठों को कौवे की चोंच के समान बनाकर ) से प्राणवायु को अन्दर भरकर उसे अपान वायु में मिला दें । इसके बाद साधक ‘हुं’ और ‘हंस’ मन्त्रों के द्वारा अपने शरीर में स्थित षट्चक्रों ( मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि व आज्ञा चक्र ) पर ध्यान करते हुए उस सोई हुई भुजंगिनी अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने का काम करें और उस जीवंत शक्ति ( कुण्डलिनी ) को ऊपर की ओर उठाते हुए अपने अधीन करने का प्रयास करें ।

इस प्रकार कुण्डलिनी शक्ति को ऊपर की ओर उठाने से साधक स्वयं को शक्तिमान मानकर परम शक्तिमान भगवान शिव के साथ संयोग करके अनेक प्रकार के सुखों के साथ निवास करते हुए परम आनन्द का अनुभव करता है ।

साधक को शिव और शक्ति के मिलन से पृथ्वी पर ही एकान्त में रहते हुए स्वयं को ब्रह्मा का अंश मानते हुए या स्वयं को ही ब्रह्मा मानते हुए परमानन्द की भावना ( अनुभूति ) करनी चाहिए ।

योनिमुद्रा को भी अन्य मुद्राओं की भाँति ही अत्यंत गोपनीय माना गया है । इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( कठिनता से प्राप्त होने वाली ) माना गया है । योनिमुद्रा में एक बार भी सिद्धि प्राप्त होने से साधक को समाधि अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।

 

 

विशेष :- योनिमुद्रा के सम्बंध में पूछा जा सकता है कि योनिमुद्रा में किस एक अन्य मुद्रा की विधि का भी प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है काकीमुद्रा । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि योनिमुद्रा में किन मन्त्रों द्वारा चक्रों का ध्यान करने की बात कही गई है ? जिसका उत्तर है हुं और हंस मन्त्रों द्वारा ।

 

 

योनिमुद्रा का फल

 

ब्रह्महा भ्रूणहाचैव सुरापी गुरुतल्पग: ।

एतै: पापैर्न लिप्येत योनिमुद्रानिबन्धनात् ।। 43 ।।

यानि पापानि घोराणि उपपापानि यानि च ।

तानि सर्वाणि नश्यन्ति योनिमुद्रानिबन्धनात् ।

तस्मादभ्यासनं कुर्याद्यदि मुक्तिं समिच्छति ।। 44 ।।

 

भावार्थ :- योनिमुद्रा का अभ्यास करने से साधक ब्रह्महत्या, गर्भपात, मदिरापान ( शराब का सेवन करने वाला ), गुरु की पत्नी के साथ सम्भोग आदि इन सभी पापों से मुक्त हो जाता है अर्थात् उसकी इन सभी पापों किसी भी प्रकार की लिप्तता ( भागीदारी ) नहीं रहती है ।

इसके अतिरिक्त जो भी घोर पाप ( घृणित या बड़े ) या सामान्य श्रेणी के पाप होते हैं । योनिमुद्रा के अभ्यास से वह सभी पाप नष्ट ( प्रभावहीन ) हो जाते हैं । अतः मुक्ति की इच्छा अथवा अभिलाषा रखने वाले साधक को योनिमुद्रा का अभ्यास करना चाहिए ।

 

 

विशेष :-  इस श्लोक में कहा गया है कि योनिमुद्रा का अभ्यास करने वाला साधक ऊपर वर्णित सभी घृणित व सामान्य पापों से मुक्त हो जाता है । इसके अर्थ को समझने में कुछ व्यक्ति गलती कर बैठते हैं । उनका मानना है कि किसी व्यक्ति ने पूर्व में ऊपर वर्णित पाप किये हों और यदि अब वह योनिमुद्रा का अभ्यास करता है तो वह उन सभी पापों से मुक्त हो जाएगा । लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है । जिस व्यक्ति ने जितने बुरे अथवा अच्छे कर्म किये हैं । उन सभी का फल उसको निश्चित रूप से मिलता है । यहाँ पर ग्रन्थकार का कहना है कि जो साधक नियमित रूप से योनिमुद्रा का अभ्यास करता है । वह ऊपर वर्णित पापों का भागीदार नहीं बनता है । वह उनसे सदा बचा रहता है । यहाँ पर पाप कर्मों से बचने की बात कही गई है न कि पाप कर्मों के फल से मुक्त होने की । जब साधक योनिमुद्रा के अभ्यास में अग्रसर रहता है तो वह इस प्रकार के घृणित कर्म करता ही नहीं है । वह सदैव इनसे दूर रहता है । तभी कहा गया है कि उसकी इन पाप कर्मों में किसी तरह की कोई लिप्तता नहीं होती ।

अतः सभी विद्यार्थी इस श्लोक के इस वास्तविक अर्थ को समझने का प्रयास करें । साथ ही इसमें बताये गए सभी पाप कर्मों को भी याद करलें । यह परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं ।

 

वज्रोणि अथवा वज्रोली मुद्रा विधि

 

धरामवष्टभ्य करयोस्तालाभ्यामूर्ध्वं क्षिपेत्यादयुगं शिर: खे ।

शक्तिप्रबोधाय चिरजीवनाय वज्रोणिमुद्रां मुनयो वदन्ति ।। 45 ।।

 

भावार्थ :- दोनों हाथों को जमीन पर रखकर दोनों पैरों व सिर को ऊपर आकाश की ओर उठाएं । शक्ति को जगाने के लिए व दीर्घायु ( लम्बी आयु ) प्राप्त करने के लिए योगियों ने वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करने की बात कही है ।

 

 

वज्रोली मुद्रा का फल

 

अयं योगो योगश्रेष्ठो योगिनां मुक्तिकारकम् ।

अयं हितप्रदो योगो योगिनां सिद्धिदायक: ।। 46 ।।

एतद्योगप्रसादेन बिन्दुसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।

सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्धयतिभूतले ।। 47 ।।

भोगेन महता युक्तो यदि मुद्रां समाचरेत् ।

तथापि सकला सिद्धिस्तस्य भवति निश्चिततम् ।। 48 ।।

 

भावार्थ :- वज्रोली मुद्रा योग साधनाओं में श्रेष्ठ बताई गई है । इसके अभ्यास से योगियों को मुक्ति प्राप्त होती है । साथ ही यह मुद्रा योगियों के लिए हितकारी व सिद्धि प्रदान करने वाली है ।

इस मुद्रा के अभ्यास से साधक को निश्चित रूप से वीर्य की सिद्धि प्राप्त होती है और वीर्य की सिद्धि प्राप्त होने से इस पृथ्वी पर कौन सा ऐसा कार्य है जिसे साधक पूरा नहीं कर सकता ? अर्थात् वीर्य की सिद्धि प्राप्त होने से साधक के लिए इस पृथ्वी पर कोई भी कार्य असम्भव नहीं है ।

यदि विषय- भोगों में पड़ा हुआ व्यक्ति भी वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करता है तो उसे भी निश्चित रूप से सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।

 

 

विशेष :- वज्रोली मुद्रा से साधक को किस सिद्धि की प्राप्ति होती है ? जिसका उत्तर है वीर्य सिद्धि । यह उपयोगी प्रश्न हो सकता है ।

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  1. ॐ गुरुदेव!
    अति सुन्दर व्याख्या।
    आपका बहुत बहुत आभार।

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