शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्ग: ।। 40 ।।   शब्दार्थ :- शौचत् ( शुद्धि के सिद्ध होने पर ) स्व ( स्वयं यानी अपने ) अङ्ग ( अंगो अर्थात शरीर के हिस्सों से ) जुगुप्सा ( घृणा या विरक्ति ) परै: ( तथा दूसरों के शरीर से भी ) असंसर्ग: ( सम्पर्क या सम्बन्ध बनाने की इच्छा नहीं

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Yoga Sutra 2 – 40

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोध: ।। 39 ।।   शब्दार्थ :- अपरिग्रह ( अनावश्यक वस्तुओं व विचारों के त्याग की स्थिति ) स्थैर्ये ( स्थिर अथवा सिद्ध होने पर ) जन्म ( जीवन से सम्बंधित ) कथन्ता ( कथा या कहानी ) सम्बोध: ( ज्ञान या जानकारी हो जाती है )   सूत्रार्थ :- अनावश्यक वस्तुओं व विचारों

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Yoga Sutra 2 – 39

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।। 38 ।।   शब्दार्थ :- ब्रह्मचर्य- प्रतिष्ठायां ( ब्रह्मचर्य के पूर्ण रूप से सिद्ध होने पर ) वीर्यलाभः ( सामर्थ्य अर्थात बल की प्राप्ति होती है । )   सूत्रार्थ :- ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह से पालन करने से साधक को अनन्त सामर्थ्य अर्थात शारीरिक व मानसिक बल की प्राप्ति होती

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Yoga Sutra 2 – 38

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नो पस्थानम् ।। 37 ।।   शब्दार्थ :- अस्तेय- प्रतिष्ठायां ( चोरी के भाव का पूरी तरह से अभाव होने पर अर्थात चोरी के भाव से पूरी तरह से मुक्ति प्राप्त होने पर ) सर्वरत्नो- पस्थानम् ( सभी प्रकार के उत्तम से उत्तम रत्न अर्थात पदार्थ प्रकट होते हैं । )   सूत्रार्थ :-

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Yoga Sutra 2 – 37

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ।। 36 ।।   शब्दार्थ :- सत्य- प्रतिष्ठायां ( सत्य अर्थात सच के सिद्ध हो जाने पर ) क्रियाफल-आश्रयत्वम् ( योगी के कहे हुए कथनों या वचनों के फल का प्रभाव अन्यों या दूसरों के ऊपर भी पड़ता है । )   सूत्रार्थ :- जब योगी मन, वचन व कर्म से सत्य को

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Yoga Sutra 2 – 36