समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ।। 45 ।। शब्दार्थ :- ईश्वर- प्रणिधानात् ( अपने समस्त कर्मों का समर्पण ईश्वर में करने से ) समाधि- सिद्धि: ( समाधि की सिद्धि अर्थात प्राप्ति होती है । ) सूत्रार्थ :- बिना किसी फल की इच्छा के अपने सभी कर्मों को ईश्वर में समर्पित करने से साधक को इस जीवन का …
स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोग: ।। 44 ।। शब्दार्थ :- स्वाध्यायत् ( स्वाध्याय का पालन करने से ) इष्टदेवता ( जिसकी हम आराधना या उपासना करते हैं । ) सम्प्रयोग: ( उसका साक्षात्कार या उससे निकटता हो जाती है । ) सूत्रार्थ :- स्वाध्याय का पालन करने से हमें अपने इष्टदेव या आराध्य देव का साक्षात्कार या …
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपस: ।। 43 ।। शब्दार्थ :- तपस: ( तप के पालन या प्रभाव से ) अशुद्धि- क्षयात् ( अशुद्धि का नाश होने से ) काय ( काया अर्थात शरीर की ) इन्द्रिय ( इन्द्रियों अर्थात कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों की ) सिद्धि: ( सिद्धि प्राप्त होती है । ) सूत्रार्थ :- तप के अनुष्ठान …
सन्तोषादनुत्तमसुखलाभ: ।। 42 ।। शब्दार्थ :- सन्तोषात् ( पूर्ण संतुष्टि से ) अनुत्तम ( सबसे उत्तम अर्थात सर्वश्रेष्ठ ) सुखलाभः ( सुख की प्राप्ति होती है । ) सूत्रार्थ :- सन्तोष अर्थात संतुष्टि का पूरी तरह से पालन करने से साधक को सभी सुखों से उत्तम अर्थात सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है …
सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय जयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ।। 41 ।। शब्दार्थ :- च ( और ) सत्त्वशुद्धि ( बुद्धि की शुद्धि ) सौमनस्य ( मन की सौम्यता अर्थात प्रसन्नता ) एकाग्र्य ( मन की स्थिरता या एकाग्रता ) इन्द्रियजय ( कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण ) आत्मदर्शन ( आत्म -साक्षात्कार की ) योग्यत्वानि ( योग्यता आती है ) …
