बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्म: ।। 50 ।।   शब्दार्थ :- बह्यवृत्ति: ( प्राणवायु को बाहर निकाल कर बाहर ही रोकना ) आभ्यंतर वृत्ति: ( प्राणवायु को अन्दर भरकर अन्दर ही रोकना ) स्तम्भवृत्ति: ( प्राणवायु को न भीतर भरना न ही बाहर छोड़ना अर्थात प्राणवायु जहाँ है उसे वहीं पर रोकना ) देश ( स्थान अर्थात

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Yoga Sutra 2 – 50

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।। 49 ।।   शब्दार्थ :- तस्मिन् सति ( उसके बाद अर्थात आसन की सिद्धि के बाद ) श्वास ( पूरक अर्थात प्राणवायु को अन्दर लेने व ) प्रश्वासयो: ( रेचक अर्थात प्राणवायु को बाहर छोड़ने की ) गतिविच्छेद: ( सामान्य गति को अपनी सुविधानुसार रोक देना या स्थिर कर देना

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Yoga Sutra 2 – 49

ततो द्वन्द्वानभिघात: ।। 48 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( तब अर्थात आसन की सिद्धि होने पर ) द्वन्द्व ( सर्दी – गर्मी ) भूख- प्यास, लाभ- हानि आदि ) अनभिघात ( आघात अर्थात कष्ट नहीं पहुँचाते )    सूत्रार्थ :- आसन के सिद्ध हो जाने पर साधक को सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, लाभ- हानि

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Yoga Sutra 2 – 48

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ।। 47 ।।   शब्दार्थ :- प्रयत्न ( सभी शारीरिक गतिविधियों या सभी प्रकार की शारीरिक कोशिशों को ) शैथिल्य ( शिथिल कर देना या रोक देना ) अनन्त ( जिसका कभी अन्त नहीं होता अर्थात ईश्वर या परमात्मा में  ) समापत्तिभ्याम् ( पूरा ध्यान लगाने से आसन में सिद्धि मिलती है । )

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Yoga Sutra 2 – 47

स्थिरसुखमासनम् ।। 46 ।।   शब्दार्थ :- स्थिर ( स्थिर अर्थात बिना हिले – डुले एक ही स्थिति में रहना ) सुखम् ( सुखमय अर्थात आरामदायक  स्थिति या अवस्था ) आसनम् ( आसन होता है । )    सूत्रार्थ :- शरीर की वह स्थिति जिसमें शरीर बिना हिले- डुले स्थिर व सुखपूर्वक अवस्था में रहता

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Yoga Sutra 2 – 46