भस्त्रिका प्राणायाम विधि   भस्त्रैव लोहकालाणां यथाक्रमेण सम्भ्रमेत् । तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनै: ।। 74 ।। एवं विंशतिवारं च कृत्वा कुर्याच्च कुम्भकम् । तदन्ते चालयेद्वायुं पूर्वोक्तं च यथाविधि ।। 75 ।।   भावार्थ :-  जिस प्रकार लोहार की धौकनी बिना रुकें निरन्तर चलती हुई वायु को अन्दर और बाहर लेती व छोड़ती रहती है

Read More
Gheranda Samhita Ch. 5 [74-82]

उज्जायी प्राणायाम विधि वर्णन   नासाभ्यां वायुमाकृष्य मुखमध्ये च धारयेत् । हृद्गलाभ्यां समाकृष्य वायुं वक्त्रे च धारयेत् ।। 68 ।। मुखं प्रक्षाल्य सवन्द्य कुर्याज्जालन्धरं तत: । आशक्ति कुम्भकं कृत्वा धारयेदविरोधात: ।। 69 ।।   भावार्थ :-  हृदय प्रदेश व गले का संकोच (  सिकोड़ते ) करते हुए दोनों नासिकाओं से वायु को अन्दर भरके उसे

Read More
Gheranda Samhita Ch. 5 [68-73]

सूर्यभेदी प्राणायाम वर्णन   कथितं सहितं कुम्भं सूर्यभेदनकं श्रृणु । पूरयेत् सूर्यनाड्या च यथाशक्ति बहिर्मरुत् ।। 57 ।। धारयेद् बहुयत्नेन कुम्भकेन जलन्धरै: । यावत् स्वेदं नखकेशाभ्यां तावत्कुर्वतु कुम्भकम् ।। 58 ।।   भावार्थ :-  सहित कुम्भक का वर्णन किया जा चुका है । अब सूर्यभेदी प्राणायाम को सुनो – अपनी दायीं नासिका से बाहर की

Read More
Gheranda Samhita Ch. 5 [57-67]

प्राणायाम के समय किन- किन अँगुलियों का प्रयोग करें ?   अनुलोमविलोमेन वारं वारं च साधयेत् । पूरकान्ते कुम्भकांते धृतनासापुटद्वयम् । कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठै: तर्जनीमध्यमे विना ।। 52 ।। भावार्थ :-  अनुलोम – विलोम अर्थात् बायीं और दायीं नासिका से इस श्वसन प्रक्रिया को बार- बार करना चाहिए । ऐसा करते हुए प्राण को शरीर में भरते

Read More
Gheranda Samhita Ch. 5 [52-56]

कुम्भक ( प्राणायाम ) वर्णन   सहित: सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा । भस्त्रिका भ्रामरी मूर्छा केवली चाष्टकुम्भिका: ।। 45 ।।   भावार्थ :-  सहित, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा व केवली ये आठ प्रकार के कुम्भक अर्थात् प्राणायाम कहे गए हैं ।     विशेष :-  इस श्लोक में घेरण्ड संहिता में वर्णित आठ

Read More
Gheranda Samhita Ch. 5 [45-51]